मंगलवार, 8 नवंबर 2011

जिन्दगी जहाँ तक खिले उसे खिलने दो ,
रौशनी को अपनी हद तक गुजरने दो //
जरा -सा प्यार काफी है सफ़र के लिए ,
निगाहों में , निगाहें जरा उतरने दो //

सोमवार, 7 नवंबर 2011

जिन्दगी जहाँ तक खिले उसे खिलने दो ,
रौशनी को अपनी हद तक गुजरने दो //

रविवार, 6 नवंबर 2011

कितने दिन से दिल टूटा है , कितने दिन से नहीं मिले हो ,
इन नयनों की पलकों में तुम ,कितने दिन से नहीं खिले हो /
मीलों -मीलों धूप खिली थी ,जब तुम बाँहों में आये थे ,
कितने मौसम बदल -बदल कर ,इस धरती पर इठलाये थे ,
छलक चुकीं हैं कितनी झीलें ,कबसे ,अबतक नहीं मिले हो /
नदियों में जो जल बहता है ,शायद खारा हो जायेगा ,
बिन बरसे यह नभ का बादल ,धुंआ -धकारा हो जायेगा ,
इसे बरसने दो तुम आखिर ,आखिर कबसे नहीं मिले हो /
जाने वाले जब जाते हैं ,सामान दिलों का ले जाते हैं ,
इस मिट्टी में क्या बचता है, जान हमारी ले जाते हैं ,
फिर भी हमको जीना है कुछ , जीवन जीते नहीं मिले हो /

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

किसी ने ध्यान न दिया मेरी तरफ ,अच्छा ही हुआ,
मेरे गुनाहों का ज़माने में चर्चा ही न हुआ /
एक-एक आंसू एक-एक दीप बन गया ,
झिलमिलायीं जब तुम , तुम्हारी सीप बन गया ,
नक्षत्रों में किसी के नक्षत्र चमकते हैं ,
डूबकर देखा तो तुम्हारा समीप बन गया /

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

तनमन डूबे कहाँ-कहाँ तक,
बदल रही थी दुनिया मुझमें /
दिवस -रैन सब एक हुए थे ,
झलक रही थी दुनिया मुझमें /

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

सिमट रहीं थीं जब तुम
सिमट रही थी दुनिया मुझमें ,
शायद कोई इस जीवन की
सँवर रही थी दुनिया मुझमें /
मुझे पता था अरमानों का
तुम्हें पता था तूफानों का,
जाने कितनी हलचल लेकर
उतर रही थी दुनिया मुझमें /
फूलों ने आबाज लगाई
नाजुक कलियाँ लगीं मचलने ,
तुमसे जो अधिकार मिले थे
सीमायें सब लगीं फिसलने /
नहीं पता था अंजामों का
आने वाले संग्रामों का ,
कितने जीते ,हार गए हम
आशायें सब लगीं उमड़ने /
मौसम आये ,मचल गए सब
ऋतुओं के संग पिघल गए सब,
दीवानापन कुछ ऐसा था
हद से हद तक गुजर गए सब /
सिमट रहीं थीं जब तुम मुझमें
सिमट रही थी दुनिया मुझमें ,
शायद कोई इस जीवन की
सँवर रही थी दुनिया मुझमें /
तन- मन डूबे कहाँ- कहाँ तक
बदल रही थी दुनिया मुझमें /
मौसम आये ,मचल गए सब
ऋतुओं के संग पिघल गए सब,
दीवानापन कुछ ऐसा था
हद से हद तक गुजर गए सब /
नहीं पता था अंजामों का
आने वाले संग्रामों का ,
कितने जीते ,हार गए हम
आशायें सब लगीं उमड़ने /
फूलों ने आबाज लगाई
नाजुक कलियाँ लगीं मचलने ,
तुमसे जो अधिकार मिले थे
सीमायें सब लगीं फिसलने /
सिमट रहीं थीं जब तुम मुझमें
सिमट रही थी दुनिया मुझमें ,
शायद कोई इस जीवन की
सँवर रही थी दुनिया मुझमें /
मुझे पता था अरमानों का
तुम्हें पता था तूफानों का,
जाने कितनी हलचल लेकर
उतर रही थी दुनिया मुझमें /

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

अभी तुम्हारी आबाज मेरी नसों में दोड़ रही है ,
अभी तुम्हारा तन-बदन ठीक वैसा ही दमक रहा है ,
अभी मैं ताजा हवाओं में जरा सैर को निकला हूँ ,
अभी तक सुबह का सूरज निगाहों में भटक रहा है /
जिस्म की हर तह तुम्हारे , तनबदन की लय बनी है,
रेशमी फुलवारियों में ,रागिनी छिड़ने लगी है ,
पंछियों की चहचहाहट ,सुन रहा हूँ गौर से मैं ,
इस धरा पर फिर तुम्हारी लालिमा खिलने लगी है /

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

जिस्म की हर तह तुम्हारे , तनबदन की लय बनी है,
रेशमी फुलवारियों से ,रागिनी छिड़ने लगी है ,
पंछियों की चहचहाहट ,सुन रहा हूँ गौर से मैं ,
इस धरा पर फिर तुम्हारी भंगिमा सजने लगी है /

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

रात भर चांदनी को बटोरा ,भर गया आँखों का कटोरा ,
देखता रहा जिन्दगी के किनारे अठखेलियाँ तुम्हारी ,
कभी डूब कर उतरा , कभी टूट कर बिखरा , कहाँ -कहाँ तक ,
लूटने आया न जाने कौन ,लूटकर चल दिया लुटेरा /

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

दिल नहीं संभला किसी से ,हाथ से अपने संभाला
ख्याल आते जा रहे थे ,गुनगुनाकर ही संभाला ,
थीं बहुत नजदीकियां पर ,दूरियां भी कम नहीं थीं ,
मुस्कुराये दर्द में भी , इस करीने से संभाला /
फूलों जबतक खिलो धरा पर ,खिलना लेकर उसकी यादें ,
अपनी खुशबु में बिखराना ,उसकी सारी ताजा यादें ,
वो आयेगी ,मुझे पता है ,बीच तुम्हारे वो आयेगी ,
इतने कोमल हो जाना तुम ,जितनी उसकी मखमल यादें /
अभी जहाँ तक ये दुनिया है , उसकी सूरत दीख रही है,
इस दुनिया की हर रौनक में, उसकी झिलमिल दीख रही है,
तुम्हें पता क्या ,दिल की धड़कन ,इस दुनिया में क्यों उठती है ,
शायद पूरी दुनिया में कुछ ,उसकी हलचल दीख रही है /
पंखुड़ियों पर ओस गिरे तो ,समझो उसका नूर झरा है,
नहीं मिलेंगी किसी चमन में ,उसकी जैसी भीगी यादें ,

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

फूलों जबतक खिलो धरा पर ,खिलना लेकर उसकी यादें ,
अपनी खुशबु में बिखराना ,उसकी सारी ताज़ी यादें ,
वो आयेगी ,मुझे पता है ,बीच तुम्हारे वो आयेगी ,
इतने कोमल हो जाना तुम ,जितनी उसकी रेशम यादें ,
अभी जहाँ तक ये दुनिया है , उसकी सूरत दीख रही है,
इस दुनिया की हर रौनक में, उसकी झिलमिल दीख रही है,
तुम्हें पता क्या ,दिल की धड़कन ,इस दुनिया में क्यों उठती है ,
शायद पूरी दुनिया में कुछ ,उसकी हलचल दीख रही है,
पंखुड़ियों पर ओस गिरे तो ,समझो उसकी नजर पड़ी है,
नहीं मिलेंगी कहीं चमन में ,उसकी जैसी भीगी यादें ,
फूलों जबतक खिलो धरा पर ,खिलना लेकर उसकी यादें ,
अपनी खुशबु में बिखराना ,उसकी सारी ताज़ी यादें ,
वो आयेगी ,मुझे पता है ,बीच तुम्हारे वो आयेगी ,
इतने कोमल हो जाना तुम ,जितनी उसकी रेशम यादें ,
अभी जहाँ तक ये दुनिया है , उसकी सूरत देख रही है,
इस दुनिया की हर रौनक में, उसकी झिलमिल दीख रही है,
तुम्हें पता क्या ,दिल की धड़कन ,इस दुनिया में क्यों उठती है ,
शायद पूरी दुनिया में कुछ ,उसकी हलचल दीख रही है,
फूलों जबतक खिलो धरा पर ,खिलना लेकर उसकी यादें ,
अपनी खुशबु में बिखराना ,उसकी सारी ताज़ी यादें ,
वो आयेगी ,मुझे पता है ,बीच तुम्हारे वो आयेगी ,
इतने कोमल हो जाना तुम ,जितनी उसकी रेशम यादें ,
पोंछ लिए जब आँसू मैंने ,ओस गिरी क्यों फिर धरती पर
मेरे दिल की हालत जैसे , छलक गयी थी फिर धरती पर ,

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है झिलमिल करती , झीलों के कुछ कतरे हों,
जब भी कोई बदली देखी , तुममें घुलकर पिघली है /
शायद कोई नींद भरी थी ,सपना कोई देखा था ,
शायद तुमको गले लगाकर ,जगना मैंने देखा था ,
हो सकता है इस दुनिया में ,मिलना -जुलना मुश्किल हो ,
लेकिन जब भी पलकें झपकीं , झलक तुम्हारी निकली है /
तुमको खो दूँ , कैसे खो दूँ, मुझको ये विश्वास नहीं,
बिना तुम्हारे पल भर जी लूँ ,मुझमें वो बिंदास नहीं ,
मेरी भी दुनिया है कोई ,मुझे बताने आ जाओ ,
जाने कबसे इस धरती पर ,सुबह न कोई निकली है
मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है झिलमिल करती , झीलों के कुछ कतरे हों,
जब भी कोई बदली देखी , तुममें घुलकर पिघली है /
शायद कोई नींद भरी थी ,सपना कोई देखा था ,
शायद तुमको गले लगाकर ,जगना मैंने देखा था ,
हो सकता है इस दुनिया में ,मिलना -जुलना मुश्किल हो ,
लेकिन जब भी पलकें झपकीं , झलक तुम्हारी निकली है /
तुमको खो दूँ , कैसे खो दूँ, मुझको ये विश्वास नहीं,
बिना तुम्हारे पल भर जी लूँ ,मुझमें वो बिंदास नहीं ,

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है कुछ कतरे हों , झीलों के झिलमिल करते ,
जब भी कोई बदली देखी , तुममें घुलकर पिघली है /
शायद कोई नींद भरी थी ,सपना कोई देखा था ,
शायद तुमको गले लगाकर ,जगना मैंने देखा था ,
हो सकता है इस दुनिया में ,मिलना -जुलना मुश्किल हो ,
लेकिन जब भी पलकें झपकीं , झलक तुम्हारी निकली है /
तुमको खो दूँ , कैसे खो दूँ, मुझको ये विश्वास नहीं,
बिना तुम्हारे पल भर जी लूँ ,मुझमें वो प्रतिभास नहीं ,
मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है कुछ कतरे हों , झीलों के झिलमिल करते ,
जब भी कोई बदली देखी , तुममें घुलकर पिघली है /
शायद कोई नींद भरी थी ,सपना कोई देखा था ,
शायद तुमको गले लगाकर ,जगना मैंने देखा था ,
हो सकता है इस दुनिया में ,मिलना -जुलना मुश्किल हो ,
जब भी पलकें झपकीं पाया , झलक तुम्हारी निकली है /
मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है कुछ कतरे हों , झीलों के झिलमिल करते ,
जब भी देखा बदली कोई , तुममें घुलकर पिघली है /
शायद कोई नींद भरी थी ,सपना कोई देखा था ,
शायद तुमको गले लगाकर ,जगना मैंने देखा था ,
हो सकता है इस दुनिया में ,मिलना -जुलना मुश्किल हो ,
लेकिन मेरी नींदों में तो ,
मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है कुछ कतरे हों , झीलों के झिलमिल करते ,
जब भी देखा बदली कोई , तुममें घुलकर पिघली है /

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है कुछ कतरे हों , झीलों के झिलमिल करते ,
जब भी देखा सिर्फ तुम्हारी ,लहराती परछाईं है /

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

कभी प्रकृति के परिधानों में , सज -सज कर तुम आ आती हो ,
कभी फूल की डाली पर तुम , मुस्कानों -सी खिल जाती हो ,
तितली -भोंरे भी मंडरा कर , अक्सर ये पूछा करते हैं ,
दिल की कितनी बातें मुझसे ,चुपके-चुपके कर जाती हो ,

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

इतना आसान नहीं है दिल को ,वर्फ बना कर मैं रख दूँ
ये पिघलेगा ,बह जायेगा ,जाने क्या -क्या कर जायेगा ,
इतना आसान नहीं है इसको सिर्फ सलामत मैं रख लूँ
यह सीने में जब धड्केगा खींच तुम्हें भी ले आयेगा /
,
भरे रहते हैं वो समंदर जिनमें हम कभी नहाये थे
मौजों के साथ उमड़ कर जिनमें छींटे बहुत उड़ाये थे
भीगी -पलकों पर जब तुमने , होंठ लगाये थे वो अपने
मत पूछो कितनी बारिश का , वो मौसम हमने देखा था ,
वो कितने गेसू दलके थे ,वो कितनी ठंडक बरसी थी
मत पूछो कितने अरमानों का घिरना हमने देखा था /

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

वो दरख़्त झूमे तो ,लगा जान बाकी है
वो फूल खिले तो , लगा मुस्कान बाकी है ,
पंछी चहचहाये , लगा उड़ान बाकी है
ख्यालों में छुपा कोई पशेमान बाकी है /
वो दरख़्त जब झूमे ,लगा जान बाकी है
वो फूल जब खिले, लगा मुस्कान बाकी है ,
पंछी जब चहचहाये , लगा उड़ान बाकी है
ख्याल जब बहुत आये ,समाधान बाकी है
तुमको पाना , तुमको खोना ,खो -खो कर, फिर तुमको पाना ,
आखिर क्यों जीने का मन है , मितवा मेरे मुझे बताना /

बुधवार, 28 सितंबर 2011

तुमको पाना , तुमको खोना ,खो -खो कर, फिर तुमको पाना ,
आखिर क्यों जीने का मन है ,

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

बटोर लेता हूँ अक्सर चाँदनी को
बिखेर देता हूँ अक्सर आस -पास ,
देख लेता हूँ अक्सर अक्स तुम्हारे
झीलों में जब घुल जाते हैं आकाश /
कौन कहता है कि उनसे बात नहीं होती
वो पहली -सी अजल मुलाकात नहीं होती ,
जब तक घूम रही है जमीं अपनी धुरी पर
आगाज तो हैं मगर आबाज नहीं होती /
जिन्दगी जब बात अपनी , कह न पाई कुछ किसी से ,
रिमझिमाते - बादलों में , भीगना अच्छा लगा था ,
दर्द जब संभले नहीं ,बहने लगे थे बेशुमार ,
कागजों की नाव में वो , तैरना अच्छा लगा था ,
जिन्दगी जब बात अपनी , कह न पाई कुछ किसी से ,
बादलों की रिमझिमों में , भीगना अच्छा लगा था ,
दर्द जब संभले नहीं ,बहने लगे थे बेशुमार ,
कागजों की नाव में कुछ तैरना अच्छा लगा था ,

सोमवार, 26 सितंबर 2011

बह रहीं हैं हर तरफ से प्यार में भीगीं हवायें ,
लो तुम्हारी याद में फिर गुनगुनाती हैं फिजायें ,
जब तलक हमको हमारी , आकृति तुममें दिखेगी ,
इस धरा पर जन्म लेंगी , भाव-भीनी कल्पनायें /

रविवार, 25 सितंबर 2011

मुझे सिसकते से दिल के सैलाबों में बहना है
कहाँ किनारे टूटेंगे जाने क्या-क्या सहना है ,
होता है जब हाहाकार समय के लम्हे-लम्हे में
शब्द भला क्या अब पूरे को कहना है ,
धूप ,हवा , या सर्दी, गर्मी , तुमको छूकर ही लगती थी ,
फूल अगर कोई खिलता था , खुशबु तुमसे ही मिलती थी ,
पता नहीं कितने अहसासों का मौसम तुममें शामिल था ,
दुनिया की हर विरल नफासत , आवेशित तुमसे मिलती थी /
धूप ,हवा , या सर्दी, गर्मी , तुमको छूकर ही लगती थी ,
फूल अगर कोई खिलता था , खुशबु तुमसे ही मिलती थी ,
पता नहीं कितने अहसासों का मौसम तुममें शामिल था ,
दुनिया में कुछ चीज अगर थी , तुममें ही बस वो मिलती थी /

शनिवार, 24 सितंबर 2011

मुझपर कुछ नहीं था लोग छीनते रहे
एक आदमी को जिन्दा भूनते रहे
बोटियों पर मेरी चाक़ू गवाह हैं
वो मुझमें खुद को दूंदते रहे /
हमसे जब रहा न गया ,कुछ भी कहा न गया
एक गुमसुम जिन्दगी का दर्द सुना न गया ,
बहते रहे दूर तक एक अजनबी की तरह
ख्याल उनका ,जब भी आया संभला न गया /

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

दुनिया में जितने साये हैं तुमसे ही खिलकर आये हैं
ये साँसें जब भी आती हैं अरमान उभरकर आये हैं ,
हो सकता है खो जायें हम जानी -अनजानी राहों में
प्यार भरा दिल जब भी उमड़ा तूफ़ान न कुछ कर पाये हैं
जानता हूँ कुछ न बचेगा एक दिन
यह दुनिया हो भी या न हो एक दिन
सीने में दफन कर भी लूँ तुम्हें अगर
फिर भी तुम ही तुम बचोगी एक दिन

बुधवार, 21 सितंबर 2011

हम कभी बिछड़ सकते हैं सोचा न था
जगह बिछड़ने की होगी सोचा न था
लोग हवा में बातें करते हैं यहाँ
बिन तुम्हारे जमीं होगी सोचा न था /

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

जितना समेटकर लाये थे दिल को उतना ही बिखेर डाला
लो फिर सिलसिला शुरू है सबकुछ आपमें ही उंडेल डाला

सोमवार, 19 सितंबर 2011

जो सवाल तुमने उठाये जबाब उनके लिख रहा हूँ
किताब मंहगी न हो जाये हिसाब दिल के लिख रहा हूँ /

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

जब भी कोई मौसम आया
मना -मना कर तुमको लाया
बिना तुम्हारे धूप न निकली
तुमने दिन भर बहुत सताया /
आँखों से वो जब भी गुजरा
छन - छनकर ही तुमसे गुजरा
झिलमिल करती रही तुम्हारी
दिव्य -अलौकिक -भौतिक छाया /
जब भी कोई मौसम आया
मना -मना कर तुमको लाया
बिना तुम्हारे धूप न निकली
तुमने दिन भर बहुत सताया /
आँखों से वो जब-जब गुजरा
बिना तुम्हारे कभी न गुजरा
कितने रंग सुनहले देखे
तुमसा कोई द्रश्य न पाया /
जब भी कोई मौसम आया
मना -मना कर तुमको लाया
बिना तुम्हारे धूप न निकली
तुमने दिन भर बहुत सताया

बुधवार, 14 सितंबर 2011

समुन्दर साथ बहता था , तुम्हारे साथ रहता था ,
वो दिल का एक कोना था बड़ा महफूज रहता था,
तरो- ताजा -से गुजरे थे हजारों मील के रस्ते ,
समुन्दर -सी निगाहों में कोई महबूब रहता था ,
समुन्दर साथ बहता था , तुम्हारे साथ रहता था ,
वो दिल का एक कोना था बड़ा महफूज रहता था,
तुम्हारे साथ गुजरे थे हजारों मील के रस्ते ,
समुन्दर -सी निगाहों में कोई महबूब रहता था ,
समुन्दर साथ बहता था , तुम्हारे साथ रहता था ,
वो दिल का एक कोना था बड़ा महफूज रहता था,
तुम्हारे साथ गुजरे थे हजारों मील के रस्ते ,
निगाहों के समुन्दर में कोई महबूब रहता था ,

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

समुन्दर साथ बहता था , तुम्हारे साथ रहता था ,
वो दिल का एक कोना था बड़ा महफूज रहता था,
तुम्हारे साथ गुजरे थे हजारों मील के रस्ते ,
निगाहों में कोई महबूब रहता था ,

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

तुमपर जो अधिकार न होता , शायद कुछ भी और न होता,
तुमपर जो अधिकार न होता , शायद कुछ भी और न होता,
पलकों में जो स्वप्न भरे थे , मदिर-मदिर से हो जाते थे ,
तुम्हें निगाहों में भरते ही, चाँद - सितारे शरमाते थे ,

बुधवार, 7 सितंबर 2011

अगर तुम्हारा प्यार न होता ,शायद कुछ भी और न होता
दिल ही दिल में गुजर गया जो , ऐसा कोई दौर न होता

सोमवार, 5 सितंबर 2011

हजरात हकीकत क्या होगी ,अंदाज लगा सकते हैं ,
उससे पहले भी यदि चाहें ,इक दाँव लगा सकते हैं ,
झंकृत कैसे होगा मन ये ,साज नहीं , परवाज नहीं,
छेड़ें कैसे हर धड़कन को ,उठती अब आबाज नहीं ,
तस्वीरें बस उभर -उभर कर, नजरों में ही रह जाती हैं ,
नजरें भी बस पिघल- पिघल कर, तस्वीरों में बह जातीं हैं ,

रविवार, 4 सितंबर 2011

हमने दिल को चीरा जब भी, तेरा उसमें पता लिखा था
हमने जब भी पलकें खोलीं ,तेरा उनमें धुंआ भरा था ,
बादल जब भी आकर बरसे ,इस धरती की हरियाली पर ,
जब भी तेरी बात चली तो आँसू से हर कुआं भरा था /
माना हमने दिल के कतरे नहीं बिखेरे अब तक शायद
इन कतरों के हर मंजर में तुम ही तुम हो पता किसे है ,

मेरी पलकें कब सूखीं थीं ,पता नहीं क्यों धरती भीगी ,
इनमें सपने तैर रहे थे पता नहीं क्यों किश्ती डूबी ,
इनमें मौसम आकर उतरे ,इनमें रस के बादल बरसे ,
इनमें कोई समा गया था ,फिर क्यों झरती कलियाँ दीखीं ,
मेरी पलकें कब सूखीं थीं ,पता नहीं क्यों धरती भीगी ,
इनमें सपने तैर रहे थे पता नहीं क्यों किश्ती डूबी ,
लगता कोई हार गया है ,खुद ही खुद को मार रहा है
जीत न पाया वो खुद को ही कितना अत्याचार हुआ है ,

शनिवार, 3 सितंबर 2011

पक्षी तिनकों को चुन -चुनकर एक घरोंदा बुन लेते हैं
हम भी चाहें तो सपनों का भारत निर्मित कर सकते हैं ,

देखो कितना वक्त गुजारा ,नहीं तुम्हारे बिना गुजारा
पल अब तक जितने भी गुजरे ,सब में था बस भरम तुम्हारा ,
इन आँखों में जो सपने हैं ,कुछ टूटे हैं ,कुछ लुटने हैं ,
अगर कभी खाली हो जायें,इनमें तुम बस जाते रहना ,
देखो कितना वक्त गुजारा ,नहीं तुम्हारे बिना गुजारा
पल अब तक जितने भी गुजरे ,सब में था बस भरम तुम्हारा ,
बहें हवायें जब तक शीतल याद हमें तुम आते रहना
दूर न होना इन नजरों से थोडा -सा शरमाते रहना ,
पता नहीं कितनी हलचल है इस मौसम की ख़ामोशी में
अगर लगे कुछ बहक रहे हैं सीने से लग जाते रहना ,

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

बहें हवायें जब तक शीतल याद हमें तुम आते रहना
दूर न होना इन नजरों से थोडा -सा शरमाते रहना ,

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

PublicTushar Devendrachaudhry
‎-every moment I enjoy your love
the lake of my eyes full of you
as sun shine spreads everywhere
the whole of my body reflect you .
the shadow of grief live within me ,
but I never leave to deflect you .

बुधवार, 31 अगस्त 2011

कल की सारी उम्मीदों पर यह दुनिया चलती रहती है ,
आने वाले पल तू मुझको थोड़ी -सी हिम्मत दे देना ,
मेरा जीना क्या जीना है ,मेरा मरना क्या मरना है ,
जब भी तुझसे कुछ माँगू तो , नादान महोब्बत दे देना/
पूरे दिन की आबाजों में ख़ामोशी भी आई थी ,
थकन , पसीने की माथे पर थोड़ी -सी सुस्ताई थी ,
हाथों की कुछ रेखाओं का घिसते जाना शामिल था ,
बची-खुची जो मायूसी थी वापस घर पर आई थी,
खामोश तमन्नाओं का फरमान सुना है हमने
सीने में दफन था कोई तूफ़ान सुना है हमने
वो चाँद निकल कर आया तस्वीर बनाकर लाया
धरती से फलक तक कोई ऐलान सुना है हमने ,
पूरे दिन की आबाजों में ख़ामोशी भी आई थी ,
थकन , पसीने की माथे पर थोड़ी -सी सुस्ताई थी ,

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

खामोश तमन्नाओं का फरमान सुना है हमने
सीने में दफन था कोई तूफ़ान सुना है हमने

सोमवार, 29 अगस्त 2011

इन साँसों में सिर्फ तुम्हारी साँसों की खुशबू रहती है ,
शायद इतना ही काफी है फुलवारी महकी रहती है,

रविवार, 28 अगस्त 2011

रेत में कितनी कशिस थी ,पांव जब तुमने धरे थे ,
भीगती थी वो कभी तो हर लहर को चूमती थी ,
बिन तुम्हारे उड़ रही है हर तरफ जैसे यहाँ पर ,
बस इसी में खो गई है जिन्दगी जो झूमती थी/

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

दर्द की दीवार पर बस, नाम तेरा ही लिखा है ,
चित्र तेरा ही लगा है ,प्यार तेरा ही भरा है ,
झिलमिलाती है कभी ये सिर्फ तेरी रौशनी से ,
सिर्फ तेरा आगमन ही बस निगाहों में भरा है , l

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

दर्द की तस्वीर मैंने इस तरह से कुछ बनाई ,
आँसुओं में घोल डाली हर सुबह की रोशनाई /
कुछ मुझे अच्छा लगा फिर जिन्दगी है एक रचना ,
हाल पर मेरे हकीकत इस तरह फिर मुस्कुराई

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

आँख खुली क्यों इतनी जल्दी ,दिन तो मेरे साथ न चलता ,
नींद नहीं क्यों आई मुझको ,दिल क्यों इतना खाली लगता ,

सोमवार, 22 अगस्त 2011

आज सुबह जब सूरज निकला , रंग गगन में भरकर निकला ,
पता नहीं क्यों इस दुनिया में ,अपनी किरणे लेकर निकला,
हमने क्या- क्या खोया था कल , ये कैसे उसको बतलाते,
बिना बताये फिर भी अपने ,सारे सपने लेकर निकला/

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

तृण पर जितनी ओस जमीं है प्यास बुझाती रहती है ,
उसपर अपनी कितनी किरणें रोज लुटाती रहती है,