Mohit Pandey
April 7
कल ही कवि-वर Tushar Devendrachaudhry का तीसरा काव्य-संग्रह "भीगे पथ से अग्नि पथ तक " प्राप्त हुआ| अभी तक कुछ गीतों को ही पढ़ पाया हूं, मगर जितने भी गीत पढ़े ऐसा लगता है की तुषार जी ने हमारे निजी जीवन- संघर्ष के संवेदात्मक अनुभवों को गीत की हर पंक्ति-२ में पिरो दिया है| गीतों को पढते हुए सारी यादें ताजा हो गई, जिस वेदना से उन्होंने गीतों को परिप्लावित किया है,उससे दृगों में आंसुओ का अम्बर छा सा जाता है ....
प्रथम प्रष्ठ पर लिखी पंक्तियां मन की व्याकुलता दर्शाती है |
"मन ओइघलाते दर्द का , दरिया बना सा रह गया है |
क्यों दृगों में स्वप्न तेरा , बस भरा-सा रह गया है |"
अपने मन के दर्द-अनुभवों को तुषार जी ने अगली पंक्ति में पूरी तरह गढ़ दिया है|
"पी तो लेता मैं अमृत पर, मुझे ग़मों ने थाम लिया |
फूलों की क्या बात करूँ जब,काटों ने आराम दिया |"
"अभी न जाने कितने आँसू, पीकर मुझको जीना होगा |
इन बूंदों में छिपा न जाने ,कितना खून-पसीना होगा |"
"अंगारों को जब पहचाना , अंगारों से हाथ जले |
इस जीवन में, इस दुनिया में, हमको ऐसे साथ मिले|"
इस जीवन की लंबी यात्रा में हर कोई किसी न किसी पडाव पर थक ही जाता है,और थक-कर ऐसा लगता है की जिंदगी खत्म सी हो गई है मगर तुषार जी ने अपनी थकावट तो दर्शायी है मगर जिंदगी जीने का नाम है भले ही कितनी भी मुसीबते आ जाये .... हमें विचलित नहीं होना है इस अग्नि पथ पर चलते ही रहना है |
"क्यों नहीं रूकती नदी यह,जिस तरह मैं रुक गया हू |
क्यों नहीं थकती हवा यह,जिस तरह मैं थक गया हूँ|"
वक़्त मुझको को मात देकर, हंस रहा है रोज मुझ पर|
किन्तु मैं भी लड़ रहा हू , बिन डरे, उससे निरंतर |
मुझे मिटाने वाले मुझको ,कितना और मिटा पाएंगे |
मेरी भी जिद है कुछ ऐसे ,तस्वीर बदल कर देखूंगा |
मुझे पूरा भरोसा है गीत पढ़ने वालों को ये गीत बहुत ही पसंद आएंगे वो इन गीतों में खुद को पाएंगे जैसे की सारे गीत उन्ही की जीवन-घटनाओ पर लिखे हुए है |
शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012
आपकी पुस्तक "भीगे पथ से अग्नि पथ तक" मिली
पहले पन्ने से आखरी पन्ने तक का सफ़र आपकी जीयन यात्रा से परिचय करता प्रतीत होता है...सरल भाषा,दिल को छूते शब्द बहुत गहरे असर करते है
कुछ पढ़ा है बहुत कुछ पढना,समझना और भीतर तक उतरना बाकि है अभी...कुछ कविताये जो मुझे बहुत पसंद आई
मै जीवित हूँ मेरा भ्रम है
जिन्दा तो बस मेरा श्रम है
****************************
जितना बादलों में पानी है
उतना नयनो में नीर भरा है
******************************
जिसकी कीमत दे न सका मै
ख़ुशी कहाँ से मेरी होती
******************************
प्यार का मंदिर ढहा तो किस लिए
कम नहीं थी यातनाये भी यहाँ
बहुत-बहुत आभार आपका एक नई दुनिया से परिचय करने का
कविता पंड्या
पहले पन्ने से आखरी पन्ने तक का सफ़र आपकी जीयन यात्रा से परिचय करता प्रतीत होता है...सरल भाषा,दिल को छूते शब्द बहुत गहरे असर करते है
कुछ पढ़ा है बहुत कुछ पढना,समझना और भीतर तक उतरना बाकि है अभी...कुछ कविताये जो मुझे बहुत पसंद आई
मै जीवित हूँ मेरा भ्रम है
जिन्दा तो बस मेरा श्रम है
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जितना बादलों में पानी है
उतना नयनो में नीर भरा है
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जिसकी कीमत दे न सका मै
ख़ुशी कहाँ से मेरी होती
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प्यार का मंदिर ढहा तो किस लिए
कम नहीं थी यातनाये भी यहाँ
बहुत-बहुत आभार आपका एक नई दुनिया से परिचय करने का
कविता पंड्या
जिन्दगी डूबे अगर तो डूब जाये बस तुम्हीं में ,
साँस जितनी भी चले अब भीग जाये बस तुम्हीं में ,
मैं उतरता जा रहा हूँ उन ख्यालों के भंवर में ,
होश मेरे खींच लें जो आखिरी अब बस तुम्हीं में //
खिल गए कितने सजीले फूल मेरी भावना में ,
मिल गये कितने नशीले कूल मेरी कामना में ,
बस तुम्हारी ज्योत्स्नाएं अब मुझे नहला रहीं हैं ,
चाहता हूँ झिलमिलाऊं मैं पिघलकर बस तुम्हीं में /
साँस जितनी भी चले अब भीग जाये बस तुम्हीं में ,
मैं उतरता जा रहा हूँ उन ख्यालों के भंवर में ,
होश मेरे खींच लें जो आखिरी अब बस तुम्हीं में //
खिल गए कितने सजीले फूल मेरी भावना में ,
मिल गये कितने नशीले कूल मेरी कामना में ,
बस तुम्हारी ज्योत्स्नाएं अब मुझे नहला रहीं हैं ,
चाहता हूँ झिलमिलाऊं मैं पिघलकर बस तुम्हीं में /
गुरुवार, 12 अप्रैल 2012
लिखते-लिखते इन गीतों को ,
कितने स्वप्न उतर आते हैं ,
कितने दर्द पिघल जाते हैं ,
कितने ज्वार उमड़ आते हैं /
धीरे-धीरे तुम आती हो ,
दिल बेकाबू कर जाती हो ,
मेरी साँसों में घुल-घुल कर ,
अपनी खुशबु भर जाती हो /
मेरे गीतों में तब शायद ,
परिवर्तन कुछ आ जाते हैं /
गीतों की पगडण्डी पर जब ,
सहसा ही तुम मिल जाती हो ,
रस्ते खुद चलने लगते हैं ,
मंजिल भी तुम बन जाती हो /
एहसास तुम्हारे कितने हैं ,
जो मुझे जिलाकर रखते हैं ,
मैं चित्र बनाता हूँ जब उनके ,
जीवन- रेखा भर जाती हो /
कितने मादक हो जाते हैं ,
जो दृश्य उभर कर आते हैं /
अक्सर प्रतिबिंबित होती हो ,
इस धरती के उन्मेषों में ,
बेचैनी जब हद की बदती ,
उठती हो भावावेशों में /
किसे पता है तुम आई हो ,
लिये बहारों की तरुणाई,
किसे पता है जल-थल में ,
तुमने ही ली है अंगडाई /
सिर्फ तुम्हारी कोमलता के ,
श्रृंगार निखर कर आते हैं /
कितने स्वप्न उतर आते हैं ,
कितने दर्द पिघल जाते हैं ,
कितने ज्वार उमड़ आते हैं /
धीरे-धीरे तुम आती हो ,
दिल बेकाबू कर जाती हो ,
मेरी साँसों में घुल-घुल कर ,
अपनी खुशबु भर जाती हो /
मेरे गीतों में तब शायद ,
परिवर्तन कुछ आ जाते हैं /
गीतों की पगडण्डी पर जब ,
सहसा ही तुम मिल जाती हो ,
रस्ते खुद चलने लगते हैं ,
मंजिल भी तुम बन जाती हो /
एहसास तुम्हारे कितने हैं ,
जो मुझे जिलाकर रखते हैं ,
मैं चित्र बनाता हूँ जब उनके ,
जीवन- रेखा भर जाती हो /
कितने मादक हो जाते हैं ,
जो दृश्य उभर कर आते हैं /
अक्सर प्रतिबिंबित होती हो ,
इस धरती के उन्मेषों में ,
बेचैनी जब हद की बदती ,
उठती हो भावावेशों में /
किसे पता है तुम आई हो ,
लिये बहारों की तरुणाई,
किसे पता है जल-थल में ,
तुमने ही ली है अंगडाई /
सिर्फ तुम्हारी कोमलता के ,
श्रृंगार निखर कर आते हैं /
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