tushar
शुक्रवार, 1 नवंबर 2013
[1]
दीप जब-जब भी जला तो
रौशनी ने तम हटाया
दीप मन का बस जलाकर
आज थोड़ा गम घटाया /
आज मेरे दर्पणों में
झांक कर देखो अगर तुम
बस तुम्हारे ही दिए हैं
जो अभी तक जल रहे हैं /
लोचनों में पूर्णिमा है
और मीलों तक अमावस
यह तुम्हारी चांदनी की
वीथियों पर चल रहे हैं /
लग रहा जैसे तुम्ही ने
आवरण , तम का हटाया
दीप जब-जब भी जला तो
रौशनी ने तम हटाया /
क्या पता कितनी अनेकों
दीपमालाएं सजी हैं
क्या पता कितनी तुम्हारी
फूलमालाएं सजी हैं ?
हम सहेजे जा रहे हैं
बस तुम्हारी मुस्कराहट
क्या पता उनमें हमारी
सुप्त -ज्वालाएं छिपी हैं ?
बस तुम्हें हम भेजते हैं
प्यार के सन्देश अपने
पर्व जैसे शोखियों का
आज हमने फिर मनाया /
[2]
धूप छनकर आ रही थी जब दरख्तों से तुम्हारी
उँगलियों से लिख रहे थे ,हम जमीं पर बेकरारी /
वक्त की साजिश बताकर, कौन जिन्दा रह सका है
धड़कनों में जो खनकतीं, धड़कनें ही थीं तुम्हारी /
देह का आकार जाने , धूळ से ही क्यों बना है
धूळ में भी देखते थे , जिंदगी बस हम तुम्हारी /
कुछ नहीं माना यहाँ पर , हम यहाँ पर क्यों टिके हैं
यह करिश्मा है तुम्हारा , यह कशिस है बस तुम्हारी /
रची -बसी -सी कोई सूरत , इन आँखों में झलक रही है ,
शाम ढली है लिए उदासी, छायाओं - सी सरक रही है ,
जितने मादक चित्र तुम्हारे, पलकों में जो अभी उतारे ,
उनकी कोई लालामी -सी, मीलों -मीलों दरक रही है //
कितने बंधन खुल जाते हैं ,अवचेतन में ,भौतिकता के ,
कितने गुम्फित हो जाते हैं,भाव , क्षणिक -सी लौकिकता के ,
रह जातीं हैं कितनी बेबस, अभिलाषाएं इस जीवन में ,
जैसे कोई छटा तुम्हारी ,पर्वत -पर्वत दमक रही है //
रची -बसी -सी कोई सूरत , इन आँखों में झलक रही है ,
शाम ढली है लिए उदासी, छायाओं - सी सरक रही है ,
[3]
सोते -सोते ,जगते-जगते
इस दुनिया ने उम्र गुजारी,
खड़ा हुआ है अंगारों पर
देखो, कबसे एक पुजारी /
मन की चाहत मन में रखना
अपनी आहें दिल में रखना
सीख रहा है जाने कबसे
देखो , आंसू का व्योपारी /
बहुत ख़ुशी के दिन भी आये
मगर नहीं वो मुस्काता है
बहुत गमों के दिन भी आये
मगर नहीं वॊ घबराता है /
चुपके-चुपके बेगानों में
निभा रहा है दुनियादारी /
उसकी आँखों में अर्चन है
उसके भावों में पूजा है
अपने प्रियतम जैसा ,उसका
कोई और न अब दूजा है /
मिलकर खोना ,खोकर मिलना
बनी हुई है क्यों लाचारी ?
[4]
आओ, हम फिर जीकर देखें, अच्छाई से जीकर देखें
मन के सारे कलुष धुलाकर, सच्चाई से जीकर देखें /
क्या खोया, क्या पाया हमने, अपनी कीमत को पहचानें
इस दुनिया की कुंठाओं पर, थोड़ा प्यार लुटाकर देखें /
देखें , अपने अंदर -बाहर , कितनी भीषण जंग छिड़ी है
लूट रहे हैं जो अस्मत को , उनको पार लगाकर देखें /
यह जीवन इक फुलवारी है ,महकी -महकी -सी क्यारी है
रंग-बिरंगे फूलों का बस , इसमें बाग़ लगाकर देखें /
एक आँसू बह रहा है, एक नदिया बह रही है,
बीच में कितने दिलों की ,टीस गहरी बह रही है,
यह छलक कर बह रहा है, वो मचल कर बह रही है,
बीच में कितने युगों की ,कसमसाहट बह रही है,
हैं हवायें सब निरुत्तर, हैं दिशायें सब निरुत्तर,
यह किसी की जुस्तजू में , रिक्त होता जा रहा है,
बर्फ की चट्टान पिघली, तो नदी वो बन गयी थी,
किन्तु यह तो खुद पिघलकर ,खुद बरसता जा रहा है,
चिर- प्रतीक्षित से द्रगों से ,यह निकल कर आ रहा है,
मौन अपनी वेदना का ,रेत पर टपका रहा है,
क्या पता इसकी कहानी , क्या निरंतर कह रही है ...
एक आँसू बह रहा है, एक नदिया बह रही है,
बीच में कितने दिलों की ,टीस गहरी बह रही है,
[5]
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था ,
एक हवा का पागल झोंका मुझे मनाने आया था,
सिर्फ तुम्हारी कमी अखर कर मुझे सताने आई थी,
पता नहीं किस हालत में यह अपना वक्त बिताया था //
ओस गिरी जो पंखुरियों पर, नम पलकों से छलकी थी ,
सूरज की किरने पी-पी कर , सतवर्णी -सी दमकी थी,
चित्र तुम्हारा गढ़ते -गढ़ते ,पूरा हिया गलाया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //
अभी परिंदे कुछ चहके थे , व्याकुलतायें टूटीं थीं ,
तितली-भोंरों ने मंडराकर ,आकुलतायें लूटीं थीं ,
बचा हुआ है कुछ तो मुझमें , दिल ने मुझे बताया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //
ऐसे भी मैं जी लेता हूँ,पल जो मुझको मिल जाते हैं,
पता नहीं क्यों इतने मादक द्रश्य यहाँ खिल जाते हैं ,
कहीं तुम्हारा अबलंबन था , मुझसे मिलने आया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //
[6]
लिखते-लिखते इन गीतों को ,
कितने स्वप्न उतर आते हैं ,
कितने दर्द पिघल जाते हैं ,
कितने ज्वार उमड़ आते हैं /
धीरे-धीरे तुम आती हो ,
दिल बेकाबू कर जाती हो ,
मेरी साँसों में घुल-घुल कर ,
अपनी खुशबु भर जाती हो /
मेरे गीतों में तब शायद ,
परिवर्तन कुछ आ जाते हैं /
गीतों की पगडण्डी पर जब ,
सहसा ही तुम मिल जाती हो ,
रस्ते खुद चलने लगते हैं ,
मंजिल भी तुम बन जाती हो /
एहसास तुम्हारे कितने हैं ,
जो मुझे जिलाकर रखते हैं ,
मैं चित्र बनाता हूँ जब उनके ,
जीवन- रेखा भर जाती हो /
कितने मादक हो जाते हैं ,
जो दृश्य उभर कर आते हैं /
अक्सर प्रतिबिंबित होती हो ,
इस धरती के उन्मेषों में ,
बेचैनी जब हद की बदती ,
उठती हो भावावेशों में /
किसे पता है तुम आई हो ,
लिये बहारों की तरुणाई,
किसे पता है जल-थल में ,
तुमने ही ली है अंगडाई /
सिर्फ तुम्हारी मादकता के ,
श्रृंगार निखर कर आते हैं /
[7]
मौसम ने करवट बदली है, बादल से बरसा है पानी,
दर्द भरा जितना सीने में, उसकी है बस यही निशानी,
जी भरके मैं रो लूँ अब या ,जी भरके ये बरसें बादल,
तेरी यादों में डूबी है, इस जीवन की एक कहानी /
शायद कोई बूँद न ऐसी ,जिसकी कोई छुअन नहीं है,
कुछ गालों पर ,कुछ धरती पर ,जिसकी कोई चुभन नहीं है,
शायद कोई प्यार भरा है ,भीगी -भीगी हरियाली में ,
शायद तेरी बात चली है, जिसमें कोई शिकन नहीं है /
फूलों ने करवट बदली है, पत्तों से झरता है पानी,
प्यास भरी जितनी सीने में ,उसकी है बस यही निशानी /
इस पानी से झील बनी हैं, इस पानी से ही तो सागर,
इस पानी में लहराता है तेरा पूरा बदन नहाकर,
झिलमिल करतीं यादें तेरी, इस पानी में ही गुमीं हुईं हैं ,
दूंद रहा हूँ कबसे तुझको ,इस पानी में जाल बिछाकर /
गांवों ने करवट बदली है, खेतों से बहता है पानी,
एक गुजरिया निकली पथ पर,बल खाती है भरी जबानी/
शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012
Mohit Pandey
April 7
कल ही कवि-वर Tushar Devendrachaudhry का तीसरा काव्य-संग्रह "भीगे पथ से अग्नि पथ तक " प्राप्त हुआ| अभी तक कुछ गीतों को ही पढ़ पाया हूं, मगर जितने भी गीत पढ़े ऐसा लगता है की तुषार जी ने हमारे निजी जीवन- संघर्ष के संवेदात्मक अनुभवों को गीत की हर पंक्ति-२ में पिरो दिया है| गीतों को पढते हुए सारी यादें ताजा हो गई, जिस वेदना से उन्होंने गीतों को परिप्लावित किया है,उससे दृगों में आंसुओ का अम्बर छा सा जाता है ....
प्रथम प्रष्ठ पर लिखी पंक्तियां मन की व्याकुलता दर्शाती है |
"मन ओइघलाते दर्द का , दरिया बना सा रह गया है |
क्यों दृगों में स्वप्न तेरा , बस भरा-सा रह गया है |"
अपने मन के दर्द-अनुभवों को तुषार जी ने अगली पंक्ति में पूरी तरह गढ़ दिया है|
"पी तो लेता मैं अमृत पर, मुझे ग़मों ने थाम लिया |
फूलों की क्या बात करूँ जब,काटों ने आराम दिया |"
"अभी न जाने कितने आँसू, पीकर मुझको जीना होगा |
इन बूंदों में छिपा न जाने ,कितना खून-पसीना होगा |"
"अंगारों को जब पहचाना , अंगारों से हाथ जले |
इस जीवन में, इस दुनिया में, हमको ऐसे साथ मिले|"
इस जीवन की लंबी यात्रा में हर कोई किसी न किसी पडाव पर थक ही जाता है,और थक-कर ऐसा लगता है की जिंदगी खत्म सी हो गई है मगर तुषार जी ने अपनी थकावट तो दर्शायी है मगर जिंदगी जीने का नाम है भले ही कितनी भी मुसीबते आ जाये .... हमें विचलित नहीं होना है इस अग्नि पथ पर चलते ही रहना है |
"क्यों नहीं रूकती नदी यह,जिस तरह मैं रुक गया हू |
क्यों नहीं थकती हवा यह,जिस तरह मैं थक गया हूँ|"
वक़्त मुझको को मात देकर, हंस रहा है रोज मुझ पर|
किन्तु मैं भी लड़ रहा हू , बिन डरे, उससे निरंतर |
मुझे मिटाने वाले मुझको ,कितना और मिटा पाएंगे |
मेरी भी जिद है कुछ ऐसे ,तस्वीर बदल कर देखूंगा |
मुझे पूरा भरोसा है गीत पढ़ने वालों को ये गीत बहुत ही पसंद आएंगे वो इन गीतों में खुद को पाएंगे जैसे की सारे गीत उन्ही की जीवन-घटनाओ पर लिखे हुए है |
April 7
कल ही कवि-वर Tushar Devendrachaudhry का तीसरा काव्य-संग्रह "भीगे पथ से अग्नि पथ तक " प्राप्त हुआ| अभी तक कुछ गीतों को ही पढ़ पाया हूं, मगर जितने भी गीत पढ़े ऐसा लगता है की तुषार जी ने हमारे निजी जीवन- संघर्ष के संवेदात्मक अनुभवों को गीत की हर पंक्ति-२ में पिरो दिया है| गीतों को पढते हुए सारी यादें ताजा हो गई, जिस वेदना से उन्होंने गीतों को परिप्लावित किया है,उससे दृगों में आंसुओ का अम्बर छा सा जाता है ....
प्रथम प्रष्ठ पर लिखी पंक्तियां मन की व्याकुलता दर्शाती है |
"मन ओइघलाते दर्द का , दरिया बना सा रह गया है |
क्यों दृगों में स्वप्न तेरा , बस भरा-सा रह गया है |"
अपने मन के दर्द-अनुभवों को तुषार जी ने अगली पंक्ति में पूरी तरह गढ़ दिया है|
"पी तो लेता मैं अमृत पर, मुझे ग़मों ने थाम लिया |
फूलों की क्या बात करूँ जब,काटों ने आराम दिया |"
"अभी न जाने कितने आँसू, पीकर मुझको जीना होगा |
इन बूंदों में छिपा न जाने ,कितना खून-पसीना होगा |"
"अंगारों को जब पहचाना , अंगारों से हाथ जले |
इस जीवन में, इस दुनिया में, हमको ऐसे साथ मिले|"
इस जीवन की लंबी यात्रा में हर कोई किसी न किसी पडाव पर थक ही जाता है,और थक-कर ऐसा लगता है की जिंदगी खत्म सी हो गई है मगर तुषार जी ने अपनी थकावट तो दर्शायी है मगर जिंदगी जीने का नाम है भले ही कितनी भी मुसीबते आ जाये .... हमें विचलित नहीं होना है इस अग्नि पथ पर चलते ही रहना है |
"क्यों नहीं रूकती नदी यह,जिस तरह मैं रुक गया हू |
क्यों नहीं थकती हवा यह,जिस तरह मैं थक गया हूँ|"
वक़्त मुझको को मात देकर, हंस रहा है रोज मुझ पर|
किन्तु मैं भी लड़ रहा हू , बिन डरे, उससे निरंतर |
मुझे मिटाने वाले मुझको ,कितना और मिटा पाएंगे |
मेरी भी जिद है कुछ ऐसे ,तस्वीर बदल कर देखूंगा |
मुझे पूरा भरोसा है गीत पढ़ने वालों को ये गीत बहुत ही पसंद आएंगे वो इन गीतों में खुद को पाएंगे जैसे की सारे गीत उन्ही की जीवन-घटनाओ पर लिखे हुए है |
आपकी पुस्तक "भीगे पथ से अग्नि पथ तक" मिली
पहले पन्ने से आखरी पन्ने तक का सफ़र आपकी जीयन यात्रा से परिचय करता प्रतीत होता है...सरल भाषा,दिल को छूते शब्द बहुत गहरे असर करते है
कुछ पढ़ा है बहुत कुछ पढना,समझना और भीतर तक उतरना बाकि है अभी...कुछ कविताये जो मुझे बहुत पसंद आई
मै जीवित हूँ मेरा भ्रम है
जिन्दा तो बस मेरा श्रम है
****************************
जितना बादलों में पानी है
उतना नयनो में नीर भरा है
******************************
जिसकी कीमत दे न सका मै
ख़ुशी कहाँ से मेरी होती
******************************
प्यार का मंदिर ढहा तो किस लिए
कम नहीं थी यातनाये भी यहाँ
बहुत-बहुत आभार आपका एक नई दुनिया से परिचय करने का
कविता पंड्या
पहले पन्ने से आखरी पन्ने तक का सफ़र आपकी जीयन यात्रा से परिचय करता प्रतीत होता है...सरल भाषा,दिल को छूते शब्द बहुत गहरे असर करते है
कुछ पढ़ा है बहुत कुछ पढना,समझना और भीतर तक उतरना बाकि है अभी...कुछ कविताये जो मुझे बहुत पसंद आई
मै जीवित हूँ मेरा भ्रम है
जिन्दा तो बस मेरा श्रम है
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जितना बादलों में पानी है
उतना नयनो में नीर भरा है
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जिसकी कीमत दे न सका मै
ख़ुशी कहाँ से मेरी होती
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प्यार का मंदिर ढहा तो किस लिए
कम नहीं थी यातनाये भी यहाँ
बहुत-बहुत आभार आपका एक नई दुनिया से परिचय करने का
कविता पंड्या
जिन्दगी डूबे अगर तो डूब जाये बस तुम्हीं में ,
साँस जितनी भी चले अब भीग जाये बस तुम्हीं में ,
मैं उतरता जा रहा हूँ उन ख्यालों के भंवर में ,
होश मेरे खींच लें जो आखिरी अब बस तुम्हीं में //
खिल गए कितने सजीले फूल मेरी भावना में ,
मिल गये कितने नशीले कूल मेरी कामना में ,
बस तुम्हारी ज्योत्स्नाएं अब मुझे नहला रहीं हैं ,
चाहता हूँ झिलमिलाऊं मैं पिघलकर बस तुम्हीं में /
साँस जितनी भी चले अब भीग जाये बस तुम्हीं में ,
मैं उतरता जा रहा हूँ उन ख्यालों के भंवर में ,
होश मेरे खींच लें जो आखिरी अब बस तुम्हीं में //
खिल गए कितने सजीले फूल मेरी भावना में ,
मिल गये कितने नशीले कूल मेरी कामना में ,
बस तुम्हारी ज्योत्स्नाएं अब मुझे नहला रहीं हैं ,
चाहता हूँ झिलमिलाऊं मैं पिघलकर बस तुम्हीं में /
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