शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

किसी ने ध्यान न दिया मेरी तरफ ,अच्छा ही हुआ,
मेरे गुनाहों का ज़माने में चर्चा ही न हुआ /
एक-एक आंसू एक-एक दीप बन गया ,
झिलमिलायीं जब तुम , तुम्हारी सीप बन गया ,
नक्षत्रों में किसी के नक्षत्र चमकते हैं ,
डूबकर देखा तो तुम्हारा समीप बन गया /

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

तनमन डूबे कहाँ-कहाँ तक,
बदल रही थी दुनिया मुझमें /
दिवस -रैन सब एक हुए थे ,
झलक रही थी दुनिया मुझमें /

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

सिमट रहीं थीं जब तुम
सिमट रही थी दुनिया मुझमें ,
शायद कोई इस जीवन की
सँवर रही थी दुनिया मुझमें /
मुझे पता था अरमानों का
तुम्हें पता था तूफानों का,
जाने कितनी हलचल लेकर
उतर रही थी दुनिया मुझमें /
फूलों ने आबाज लगाई
नाजुक कलियाँ लगीं मचलने ,
तुमसे जो अधिकार मिले थे
सीमायें सब लगीं फिसलने /
नहीं पता था अंजामों का
आने वाले संग्रामों का ,
कितने जीते ,हार गए हम
आशायें सब लगीं उमड़ने /
मौसम आये ,मचल गए सब
ऋतुओं के संग पिघल गए सब,
दीवानापन कुछ ऐसा था
हद से हद तक गुजर गए सब /
सिमट रहीं थीं जब तुम मुझमें
सिमट रही थी दुनिया मुझमें ,
शायद कोई इस जीवन की
सँवर रही थी दुनिया मुझमें /
तन- मन डूबे कहाँ- कहाँ तक
बदल रही थी दुनिया मुझमें /
मौसम आये ,मचल गए सब
ऋतुओं के संग पिघल गए सब,
दीवानापन कुछ ऐसा था
हद से हद तक गुजर गए सब /
नहीं पता था अंजामों का
आने वाले संग्रामों का ,
कितने जीते ,हार गए हम
आशायें सब लगीं उमड़ने /
फूलों ने आबाज लगाई
नाजुक कलियाँ लगीं मचलने ,
तुमसे जो अधिकार मिले थे
सीमायें सब लगीं फिसलने /
सिमट रहीं थीं जब तुम मुझमें
सिमट रही थी दुनिया मुझमें ,
शायद कोई इस जीवन की
सँवर रही थी दुनिया मुझमें /
मुझे पता था अरमानों का
तुम्हें पता था तूफानों का,
जाने कितनी हलचल लेकर
उतर रही थी दुनिया मुझमें /

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

अभी तुम्हारी आबाज मेरी नसों में दोड़ रही है ,
अभी तुम्हारा तन-बदन ठीक वैसा ही दमक रहा है ,
अभी मैं ताजा हवाओं में जरा सैर को निकला हूँ ,
अभी तक सुबह का सूरज निगाहों में भटक रहा है /
जिस्म की हर तह तुम्हारे , तनबदन की लय बनी है,
रेशमी फुलवारियों में ,रागिनी छिड़ने लगी है ,
पंछियों की चहचहाहट ,सुन रहा हूँ गौर से मैं ,
इस धरा पर फिर तुम्हारी लालिमा खिलने लगी है /

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

जिस्म की हर तह तुम्हारे , तनबदन की लय बनी है,
रेशमी फुलवारियों से ,रागिनी छिड़ने लगी है ,
पंछियों की चहचहाहट ,सुन रहा हूँ गौर से मैं ,
इस धरा पर फिर तुम्हारी भंगिमा सजने लगी है /

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

रात भर चांदनी को बटोरा ,भर गया आँखों का कटोरा ,
देखता रहा जिन्दगी के किनारे अठखेलियाँ तुम्हारी ,
कभी डूब कर उतरा , कभी टूट कर बिखरा , कहाँ -कहाँ तक ,
लूटने आया न जाने कौन ,लूटकर चल दिया लुटेरा /

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

दिल नहीं संभला किसी से ,हाथ से अपने संभाला
ख्याल आते जा रहे थे ,गुनगुनाकर ही संभाला ,
थीं बहुत नजदीकियां पर ,दूरियां भी कम नहीं थीं ,
मुस्कुराये दर्द में भी , इस करीने से संभाला /
फूलों जबतक खिलो धरा पर ,खिलना लेकर उसकी यादें ,
अपनी खुशबु में बिखराना ,उसकी सारी ताजा यादें ,
वो आयेगी ,मुझे पता है ,बीच तुम्हारे वो आयेगी ,
इतने कोमल हो जाना तुम ,जितनी उसकी मखमल यादें /
अभी जहाँ तक ये दुनिया है , उसकी सूरत दीख रही है,
इस दुनिया की हर रौनक में, उसकी झिलमिल दीख रही है,
तुम्हें पता क्या ,दिल की धड़कन ,इस दुनिया में क्यों उठती है ,
शायद पूरी दुनिया में कुछ ,उसकी हलचल दीख रही है /
पंखुड़ियों पर ओस गिरे तो ,समझो उसका नूर झरा है,
नहीं मिलेंगी किसी चमन में ,उसकी जैसी भीगी यादें ,

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

फूलों जबतक खिलो धरा पर ,खिलना लेकर उसकी यादें ,
अपनी खुशबु में बिखराना ,उसकी सारी ताज़ी यादें ,
वो आयेगी ,मुझे पता है ,बीच तुम्हारे वो आयेगी ,
इतने कोमल हो जाना तुम ,जितनी उसकी रेशम यादें ,
अभी जहाँ तक ये दुनिया है , उसकी सूरत दीख रही है,
इस दुनिया की हर रौनक में, उसकी झिलमिल दीख रही है,
तुम्हें पता क्या ,दिल की धड़कन ,इस दुनिया में क्यों उठती है ,
शायद पूरी दुनिया में कुछ ,उसकी हलचल दीख रही है,
पंखुड़ियों पर ओस गिरे तो ,समझो उसकी नजर पड़ी है,
नहीं मिलेंगी कहीं चमन में ,उसकी जैसी भीगी यादें ,
फूलों जबतक खिलो धरा पर ,खिलना लेकर उसकी यादें ,
अपनी खुशबु में बिखराना ,उसकी सारी ताज़ी यादें ,
वो आयेगी ,मुझे पता है ,बीच तुम्हारे वो आयेगी ,
इतने कोमल हो जाना तुम ,जितनी उसकी रेशम यादें ,
अभी जहाँ तक ये दुनिया है , उसकी सूरत देख रही है,
इस दुनिया की हर रौनक में, उसकी झिलमिल दीख रही है,
तुम्हें पता क्या ,दिल की धड़कन ,इस दुनिया में क्यों उठती है ,
शायद पूरी दुनिया में कुछ ,उसकी हलचल दीख रही है,
फूलों जबतक खिलो धरा पर ,खिलना लेकर उसकी यादें ,
अपनी खुशबु में बिखराना ,उसकी सारी ताज़ी यादें ,
वो आयेगी ,मुझे पता है ,बीच तुम्हारे वो आयेगी ,
इतने कोमल हो जाना तुम ,जितनी उसकी रेशम यादें ,
पोंछ लिए जब आँसू मैंने ,ओस गिरी क्यों फिर धरती पर
मेरे दिल की हालत जैसे , छलक गयी थी फिर धरती पर ,

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है झिलमिल करती , झीलों के कुछ कतरे हों,
जब भी कोई बदली देखी , तुममें घुलकर पिघली है /
शायद कोई नींद भरी थी ,सपना कोई देखा था ,
शायद तुमको गले लगाकर ,जगना मैंने देखा था ,
हो सकता है इस दुनिया में ,मिलना -जुलना मुश्किल हो ,
लेकिन जब भी पलकें झपकीं , झलक तुम्हारी निकली है /
तुमको खो दूँ , कैसे खो दूँ, मुझको ये विश्वास नहीं,
बिना तुम्हारे पल भर जी लूँ ,मुझमें वो बिंदास नहीं ,
मेरी भी दुनिया है कोई ,मुझे बताने आ जाओ ,
जाने कबसे इस धरती पर ,सुबह न कोई निकली है
मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है झिलमिल करती , झीलों के कुछ कतरे हों,
जब भी कोई बदली देखी , तुममें घुलकर पिघली है /
शायद कोई नींद भरी थी ,सपना कोई देखा था ,
शायद तुमको गले लगाकर ,जगना मैंने देखा था ,
हो सकता है इस दुनिया में ,मिलना -जुलना मुश्किल हो ,
लेकिन जब भी पलकें झपकीं , झलक तुम्हारी निकली है /
तुमको खो दूँ , कैसे खो दूँ, मुझको ये विश्वास नहीं,
बिना तुम्हारे पल भर जी लूँ ,मुझमें वो बिंदास नहीं ,

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है कुछ कतरे हों , झीलों के झिलमिल करते ,
जब भी कोई बदली देखी , तुममें घुलकर पिघली है /
शायद कोई नींद भरी थी ,सपना कोई देखा था ,
शायद तुमको गले लगाकर ,जगना मैंने देखा था ,
हो सकता है इस दुनिया में ,मिलना -जुलना मुश्किल हो ,
लेकिन जब भी पलकें झपकीं , झलक तुम्हारी निकली है /
तुमको खो दूँ , कैसे खो दूँ, मुझको ये विश्वास नहीं,
बिना तुम्हारे पल भर जी लूँ ,मुझमें वो प्रतिभास नहीं ,
मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है कुछ कतरे हों , झीलों के झिलमिल करते ,
जब भी कोई बदली देखी , तुममें घुलकर पिघली है /
शायद कोई नींद भरी थी ,सपना कोई देखा था ,
शायद तुमको गले लगाकर ,जगना मैंने देखा था ,
हो सकता है इस दुनिया में ,मिलना -जुलना मुश्किल हो ,
जब भी पलकें झपकीं पाया , झलक तुम्हारी निकली है /
मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है कुछ कतरे हों , झीलों के झिलमिल करते ,
जब भी देखा बदली कोई , तुममें घुलकर पिघली है /
शायद कोई नींद भरी थी ,सपना कोई देखा था ,
शायद तुमको गले लगाकर ,जगना मैंने देखा था ,
हो सकता है इस दुनिया में ,मिलना -जुलना मुश्किल हो ,
लेकिन मेरी नींदों में तो ,
मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है कुछ कतरे हों , झीलों के झिलमिल करते ,
जब भी देखा बदली कोई , तुममें घुलकर पिघली है /

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

मेरी आँखों से मत पूछो ,मेरी दुनिया कैसी है ,
अभी तुम्हारी आँखों से ये, बाहर ही कब निकली है ,
हो सकता है कुछ कतरे हों , झीलों के झिलमिल करते ,
जब भी देखा सिर्फ तुम्हारी ,लहराती परछाईं है /

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

कभी प्रकृति के परिधानों में , सज -सज कर तुम आ आती हो ,
कभी फूल की डाली पर तुम , मुस्कानों -सी खिल जाती हो ,
तितली -भोंरे भी मंडरा कर , अक्सर ये पूछा करते हैं ,
दिल की कितनी बातें मुझसे ,चुपके-चुपके कर जाती हो ,