शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

Mohit Pandey
April 7
कल ही कवि-वर Tushar Devendrachaudhry का तीसरा काव्य-संग्रह "भीगे पथ से अग्नि पथ तक " प्राप्त हुआ| अभी तक कुछ गीतों को ही पढ़ पाया हूं, मगर जितने भी गीत पढ़े ऐसा लगता है की तुषार जी ने हमारे निजी जीवन- संघर्ष के संवेदात्मक अनुभवों को गीत की हर पंक्ति-२ में पिरो दिया है| गीतों को पढते हुए सारी यादें ताजा हो गई, जिस वेदना से उन्होंने गीतों को परिप्लावित किया है,उससे दृगों में आंसुओ का अम्बर छा सा जाता है ....
प्रथम प्रष्ठ पर लिखी पंक्तियां मन की व्याकुलता दर्शाती है |

"मन ओइघलाते दर्द का , दरिया बना सा रह गया है |
क्यों दृगों में स्वप्न तेरा , बस भरा-सा रह गया है |"

अपने मन के दर्द-अनुभवों को तुषार जी ने अगली पंक्ति में पूरी तरह गढ़ दिया है|

"पी तो लेता मैं अमृत पर, मुझे ग़मों ने थाम लिया |
फूलों की क्या बात करूँ जब,काटों ने आराम दिया |"

"अभी न जाने कितने आँसू, पीकर मुझको जीना होगा |
इन बूंदों में छिपा न जाने ,कितना खून-पसीना होगा |"

"अंगारों को जब पहचाना , अंगारों से हाथ जले |
इस जीवन में, इस दुनिया में, हमको ऐसे साथ मिले|"
इस जीवन की लंबी यात्रा में हर कोई किसी न किसी पडाव पर थक ही जाता है,और थक-कर ऐसा लगता है की जिंदगी खत्म सी हो गई है मगर तुषार जी ने अपनी थकावट तो दर्शायी है मगर जिंदगी जीने का नाम है भले ही कितनी भी मुसीबते आ जाये .... हमें विचलित नहीं होना है इस अग्नि पथ पर चलते ही रहना है |

"क्यों नहीं रूकती नदी यह,जिस तरह मैं रुक गया हू |
क्यों नहीं थकती हवा यह,जिस तरह मैं थक गया हूँ|"

वक़्त मुझको को मात देकर, हंस रहा है रोज मुझ पर|
किन्तु मैं भी लड़ रहा हू , बिन डरे, उससे निरंतर |

मुझे मिटाने वाले मुझको ,कितना और मिटा पाएंगे |
मेरी भी जिद है कुछ ऐसे ,तस्वीर बदल कर देखूंगा |
मुझे पूरा भरोसा है गीत पढ़ने वालों को ये गीत बहुत ही पसंद आएंगे वो इन गीतों में खुद को पाएंगे जैसे की सारे गीत उन्ही की जीवन-घटनाओ पर लिखे हुए है |
Neeraj Tripathi --
Thank you sir, for the wonderful book... [ भीगे पथ से अग्नि पथ तक ]....Its a gem.

Vijai K Singh ----
-तुषार जी आपकी कविताओं में एक खास लय है , तरन्नुम है संगीत है ....... अच्छा सा लगता है ..
चेतन रामकिशन-
आपका अनमोल साहित्य और आपकी नेक छवि! असाधारण व्यक्तित्व है आपका!
आपकी पुस्तक "भीगे पथ से अग्नि पथ तक" मिली

पहले पन्ने से आखरी पन्ने तक का सफ़र आपकी जीयन यात्रा से परिचय करता प्रतीत होता है...सरल भाषा,दिल को छूते शब्द बहुत गहरे असर करते है

कुछ पढ़ा है बहुत कुछ पढना,समझना और भीतर तक उतरना बाकि है अभी...कुछ कविताये जो मुझे बहुत पसंद आई

मै जीवित हूँ मेरा भ्रम है

जिन्दा तो बस मेरा श्रम है

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जितना बादलों में पानी है

उतना नयनो में नीर भरा है

******************************

जिसकी कीमत दे न सका मै

ख़ुशी कहाँ से मेरी होती

******************************

प्यार का मंदिर ढहा तो किस लिए

कम नहीं थी यातनाये भी यहाँ

बहुत-बहुत आभार आपका एक नई दुनिया से परिचय करने का

कविता पंड्या
Dinesh Verma-- अगर कम शब्दों में सच कहना हो तो ऐसे कहूँगा कि आपकी रचनाओं की गहराई को जिसने समझ लिया, फिर वो इस में इतना डूबेगा उतरायेगा कि उसे अपना होश तक न रहेगा..इसका कारण ये है कि आपने खुद इतना डूब कर लिखा है कि आप भी उस गहराई से उबर न सके... आपको और आपकी लेखनी को नमन.
जिन्दगी डूबे अगर तो डूब जाये बस तुम्हीं में ,
साँस जितनी भी चले अब भीग जाये बस तुम्हीं में ,
मैं उतरता जा रहा हूँ उन ख्यालों के भंवर में ,
होश मेरे खींच लें जो आखिरी अब बस तुम्हीं में //

खिल गए कितने सजीले फूल मेरी भावना में ,
मिल गये कितने नशीले कूल मेरी कामना में ,
बस तुम्हारी ज्योत्स्नाएं अब मुझे नहला रहीं हैं ,
चाहता हूँ झिलमिलाऊं मैं पिघलकर बस तुम्हीं में /

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

लिखते-लिखते इन गीतों को ,
कितने स्वप्न उतर आते हैं ,
कितने दर्द पिघल जाते हैं ,
कितने ज्वार उमड़ आते हैं /
धीरे-धीरे तुम आती हो ,
दिल बेकाबू कर जाती हो ,
मेरी साँसों में घुल-घुल कर ,
अपनी खुशबु भर जाती हो /
मेरे गीतों में तब शायद ,
परिवर्तन कुछ आ जाते हैं /

गीतों की पगडण्डी पर जब ,
सहसा ही तुम मिल जाती हो ,
रस्ते खुद चलने लगते हैं ,
मंजिल भी तुम बन जाती हो /
एहसास तुम्हारे कितने हैं ,
जो मुझे जिलाकर रखते हैं ,
मैं चित्र बनाता हूँ जब उनके ,
जीवन- रेखा भर जाती हो /
कितने मादक हो जाते हैं ,
जो दृश्य उभर कर आते हैं /

अक्सर प्रतिबिंबित होती हो ,
इस धरती के उन्मेषों में ,
बेचैनी जब हद की बदती ,
उठती हो भावावेशों में /
किसे पता है तुम आई हो ,
लिये बहारों की तरुणाई,
किसे पता है जल-थल में ,
तुमने ही ली है अंगडाई /
सिर्फ तुम्हारी कोमलता के ,
श्रृंगार निखर कर आते हैं /

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

रची -बसी -सी सूरत कोई, इन आँखों में झलक रही है ,
शाम दली है लिए उदासी, छायाओं - सी सरक रही है ,
जितने मादक चित्र तुम्हारे, पलकों में जो अभी उतारे ,
उनकी कोई लालामी -सी, मीलों -मीलों दरक रही है //
कितने बंधन खुल जाते हैं ,अवचेतन में भौतिकता के ,
कितने गुम्फित हो जाते हैं,भाव , क्षणिक -सी लौकिकता के ,
रह जातीं हैं कितनी बेबस, अभिलाषाएं इस जीवन में ,
जैसे कोई छटा तुम्हारी ,पर्वत -पर्वत दमक रही है //

गुरुवार, 15 मार्च 2012

अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था ,
एक हवा का पागल झोंका मुझे मनाने आया था,
सिर्फ तुम्हारी कमी अखर कर मुझे सताने आई थी,
पता नहीं किस हालत में यह अपना वक्त बिताया था //

ओस गिरी जो पंखुरियों पर, नम पलकों से छलकी थी ,
सूरज की किरने पी-पी कर , सतवर्णी -सी दमकी थी,
चित्र तुम्हारा गदते -गदते ,पूरा हिया गलाया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //

अभी परिंदे कुछ चहके थे , व्याकुलतायें टूटीं थीं ,
तितली-भोंरों ने मंडराकर ,आकुलतायें लूटीं थीं ,
बचा हुआ था कुछ तो मुझमें ,शायद मुझे बताया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //

ऐसे भी मैं जी लेता हूँ,पल जो मुझको मिल जाते हैं,
पता नहीं क्यों इतने मादक द्रश्य यहाँ खिल जाते हैं ,
कहीं तुम्हारा अबलंबन था , मुझसे मिलने आया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //
अभी परिंदे कुछ चहके थे , व्याकुलतायें टूटीं थीं ,
तितली-भोंरों ने मंडराकर ,आकुलतायें लूटीं थीं ,
बचा हुआ था कुछ तो मुझमें ,शायद मुझे बताया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //
ऐसे भी मैं जी लेता हूँ,पल जो मुझको मिल जाते हैं,
पता नहीं क्यों इतने मादक द्रश्य यहाँ खिल जाते हैं ,
कहीं तुम्हारा अबलंबन था , मुझसे मिलने आया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //

मंगलवार, 13 मार्च 2012

अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था ,
एक हवा का पागल झोंका मुझे मनाने आया था,
सिर्फ तुम्हारी कमी अखर कर मुझे सताने आई थी,
पता नहीं किस हालत में यह अपना वक्त बिताया था //

सोमवार, 12 मार्च 2012

ओस गिरी जो पंखुरियों पर, नम पलकों से छलकी थी ,
सूरज की किरने पी-पी कर , सतवर्णी -सी दमकी थी,
चित्र तुम्हारा गदते -गदते ,पूरा हिया गलाया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //

गुरुवार, 8 मार्च 2012

देश में प्रमुख रूप से दो राजनीतिक दल हैं एक कांग्रेस दूसरा भाजपा /इसके अलावा जितने दल हैं किसी न किसी रूप में इन दोनों दलों के घटक दल हैं /कांग्रेस अल्पसंख्यकों तथा दलितों को बिना शर्त देश की मुख्य धारा में लाना चाहती है जबकि भाजपा अल्पसंख्यकों को यथास्थिति में रखना चाहती है तथा दलितों के साथ सदियों से चली आ रही वर्ण व्यवस्था से ऊपर उठकर रातों- रात उन्हें गले से लगाने को तत्पर नहीं ? जाहिर है यह सामाजिक सोच जो इन दोनों दलों की ताकत और कमजोरी का परिचायक भी है / देश में 85 प्रतिशत हिन्दू और 15 प्रतिशत अल्पसंख्यक हैं /आजादी के बाद देश के सभी हिन्दू संगठनों ने अल्पसंख्यक वर्ग को शक की निगाह से देखा और सभी अल्पसंख्यक वर्गों ने हिन्दू समाज को डर की निगाह से / मगर अब स्थिति बहुत बदल गई है / देश में भाई- चारा अपने चरम पर है पहले जैसा माहौल नहीं है /
इस बदली हुई परिस्थिति में जाति- धर्म आधारित दलों का बजूद में आना चिंता का विषय है /विशेषकर उत्तरप्रदेश में समाजवादी दल तथा बहुजन समाज दल का अलग से अपना जाल फैलाना देश को सौ साल पीछे धकेलता है / उन्हें कांग्रेस या भाजपा में रहकर देश के व्यापक हितों के बारे में सोचना चाहिए /वो अलग रहकर न तो अपने हितों की रक्षा कर पायेंगे न देश के सर्वांगीण विकास में भाग ले पाएंगे / ताली एक हाथ से नहीं दोनों हाथों से बजती है/ आखिर वो ऐसा क्यों सोचते हैं कि वो अलग बजूद में आकर सौदेबाजी कर सकेंगे / सौदेबाजी हर हाल में घातक है /
भाजपा विशेषकर हिन्दू संगठनों का दल है जिसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख है / भाजपा को सांप्रदायिक कहना अनुचित है / हिन्दू बहुल देश में हिन्दू दल नहीं होगा तो क्या हिन्दू विनाशक दल होगा ? मुझे आज तक यह दलील समझ नहीं आई कि भाजपा सांप्रदायिक है / यह दूसरी बात है कि यह दल अल्पसंख्यकों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने के लिए एक विश्वास भरी सार्थक पहल चाहता है /
कांग्रेस देश को अपने तरीके से जोड़ना चाहती है ,भाजपा अपने तरीके से / दोनों दलों की आर्थिक नीतियाँ लगभग समान हैं / विदेश नीति में भी कोई बड़ा फर्क नहीं सिर्फ कश्मीर को छोड़कर / कोई कितनी कोशिश करले भारत को इन दोनों दलों से मिलाकर ही अपने आकार में द्रष्टिगोचर होता /

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

लोकप्रियता की द्रष्टि से हिंदी कविता और उसका भविष्य
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आधुनिक हिंदी कविता के जनक अगर गिनाये जाएँ तो सुभद्रा कुमारी चौहान ,महादेवी बर्मा , सुमित्रा नंदन पन्त ,जय शंकर प्रसाद ,डाक्टर हरिवंश राय बच्चन और गोपालदास नीरज का नाम जबतक हिंदी कविता रहेगी अमर रहेगा / साथ ही कविता के समीक्षाकारों आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा हजारी प्रसाद द्विवेदी के बिना कविता की व्याख्या अधूरी रहेगी /यह युग लगभग साठ के दशक के साथ समाप्त हो गया /
उस ज़माने में दो साप्ताहिक पत्रिकाएं -धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान अत्यंत लोकप्रिय थे / पूरे हिंदी जगत में उनकी मान्यता थी /जो लेखक या कवि इन पत्रिकाओं में प्रकाशित हो जाते थे उन्हें साहित्यकार का दर्जा मिल जाता था / दोनों ही पत्रिकाएं बहुत ही उच्च स्तर की सामग्री प्रस्तुत करती थीं जिसे पाठक वर्ग बहुत ही रूचि से देखता था / बाद में ज्ञानोदय नाम की पत्रिका निकली उसका स्तर भी काफी अच्छा माना गया / मैं इन पत्रिकाओं का नियमित पाठक था /
जहाँ तक पाठ्यक्रम की बात है उसमें साहित्य की द्रष्टि से उसका पूरा प्रतिनिधित्व करने वाली रचनाओं का चयन होता था / जो विद्यार्थी अंग्रेजी साहित्य भी साथ पदते थे उन्हें हिंदी कविता और अंग्रेजी कविता का तुलनात्मक अध्ययन भी हो जाता था / जहाँ तक हिंदी कविता की बात है अंग्रेजी कविता से किसी भी द्रष्टि में कम नहीं थी बल्कि हिंदी कविता पर भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर थी जो उसे संस्कृत साहित्य से मिली थी /
सन [1960 ] में मैंने कविता लिखना शुरू कर दिया था /जब मैंने लिखना शुरू किया कविता में परिवर्तन लाने के प्रयास शुरू हो गये /ऐसे परिवर्तन जो कविता को कविता के रूप में ही नहीं बल्कि उसे उसके परम्परागत शिल्प , छन्द से मुक्त कर देने के लिए ,उसके बहिष्कार तक जा पहुंचे / मेरे लिए यह एक आघात था /
कवि नीरज जो उन दिनों में कवि सम्मेलनों के लोकप्रिय कवि के रूप में स्थापित हो चुके थे उन्हें भी इस तरह के प्रयास विचलित कर रहे थे /वो कविता के परम्परागत स्वरुप के समर्थक थे / एक तरफ कविता के खिलाफ चौतरफा हमला हो रहा था तो दूसरी तरफ कवि नीरज अकेले ही कविता को सींचते रहे जिलाते रहे /पत्र - पत्रिकाओं में अतुकांत कविता चल निकली /कवि सम्मेलनों में भी खपने लगी / मगर नीरज को कोई माई का लाल चुनौती नहीं दे पाया /
22 अक्तूबर 1961 को साप्ताहिक हिंदुस्तान में मेरा एक बालगीत प्रकाशित हुआ जो इस प्रकार था ---
जग है कितना सुन्दर सपना |
नीला अम्बर, चाँद, सितारे ,
चलो चलें हम नदी किनारे ,
तट पर जाकर देखेंगे हम,
लहरों का लहरों से मिलना |
जग है कितना सुन्दर सपना ||
आज मनुजता क्यों रोती है ,
क्यों दुःख के साये छाए हैं ?
निशि को देखो इठलाती है ,
इसने तो मोती पाए हैं |
मौसम में आकर्षण होता ,
जब आता फूलों को खिलना ||
आओ हम भी मिलकर खेलें ,
मस्त चांदनी में संग हो लें ,
गीत ख़ुशी का मिलकर गाएं ,
चलो सीपियाँ तट पर रोलें |
तन का दुःख भी मिट जायेगा ,
सुखी ह्रदय जब होगा अपना ||

इस बाल गीत के प्रकाशित हो जाने पर जैसे मैंने चैन की साँस ली |मुझे लगा मेरी कवितायेँ अब नियमित रूप से प्रकाशित होती रहेंगी |मैं साप्ताहिक के सह संपादक श्री बाल स्वरुप 'राही ' के संपर्क में था | वो मुझे बहुत स्नेह करते थे | उन्होंने मुझे समझाया मैं साप्ताहिक में छपने की अपेक्षा ना रखूं | देश की अन्य छोटी -छोटी पत्र -पत्रिकाओं में अपनी रचनाएँ भेजूं | मुझे छपने की कोई लालसा नहीं थी न मैं किसी लोकप्रियता का भूखा था | मुझे कवि सम्मेलनों में भाग लेना भी पसंद नहीं था | मैंने तय कर लिया था कि अगर कवितायेँ छपें तो सिर्फ साप्ताहिक में या फिर धर्मयुग में अन्यथा नहीं | फिर भी उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि मैं अपनी रचनाएँ उन्हें भेजता रहूँ |

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

आओ हम भी लिखकर देखें इस भारत की नई कहानी ,
इसकी नदियों में बहता हो , अमृत जैसा निर्मल पानी /
इसके लोगों की ताकत का अंदाज लगाना मुश्किल हो ,
जहाँ - जहाँ भी हम निकलें तो ,छलके इसमें नई जबानी //
अच्छे -अच्छे लोग यहाँ हों ,सच्चे-सच्चे लोग यहाँ हों ,
एक तपोवन बन जाए यह, ऐसा हो हर हिन्दुस्तानी //

कोई कोशिस ऐसी करलें ,नहीं किसी का हक़ छिन पाए ,
थोड़ी- सी तकलीफें सह लें , भूखा कोई मर ना पाए /
मेहनत करने वालों का यह देश हमेशा कहलाया है ,
इसकी मिट्टी का अब कोई ,दिया ,कभी ना बुझने पाए //
लोग यहाँ जो पैदा होते ,जज्बा ऐसा हो जाता है ,
औरों की खातिर जीते हैं , दे देते हैं हर क़ुरबानी //

आओ ,अपने सपने भर दें ,लोकतंत्र के गलियारों में ,
मिल-जुल कर हम रहना सीखें ,इसके सिंचित गुलजारों में/
इसे बनाना , इसे उठाना, लक्ष्य हमारा बस इतना हो ,
जब भी अपने कदम उठें तो ,उठें इसी के उजियारों में //

कोई ऐसी फसल उगा दें ,जन -जन में खुशहाली लाये ,
कोई ऐसा भारत गद दें ,चमके जिसकी अमर निशानी //
आओ हम भी लिखकर देखें इस भारत की नई कहानी ,
इसकी नदियों में बहता हो , अमृत जैसा निर्मल पानी / /
आओ हम भी लिखकर देखें इस भारत की नई कहानी ,
इसकी नदियों में बहता हो , अमृत जैसा निर्मल पानी /
इसके लोगों की ताकत का अंदाज लगाना मुश्किल हो ,
जहाँ - जहाँ भी हम निकलें तो ,छलके इसमें नई जबानी //
अच्छे -अच्छे लोग यहाँ हों ,सच्चे-सच्चे लोग यहाँ हों ,
एक तपोवन बन जाए यह, ऐसा हो हर हिन्दुस्तानी //

कोई कोशिस ऐसी करलें ,नहीं किसी का हक़ छिन पाए ,
थोड़ी- सी तकलीफें सह लें , भूखा कोई मर ना पाए /
मेहनत करने वालों का यह देश हमेशा कहलाया है ,
इसकी मिट्टी का अब कोई ,दिया ,कभी ना बुझने पाए //
लोग यहाँ जो पैदा होते ,जज्बा ऐसा हो जाता है ,
औरों की खातिर जीते हैं , दे देते हैं हर क़ुरबानी //

आओ ,अपने सपने भर दें ,लोकतंत्र के गलियारों में ,
मिल-जुल कर हम रहना सीखें ,इसके सिंचित गुलजारों में/
इसे बनाना , इसे उठाना, लक्ष्य हमारा बस इतना हो ,
जब भी अपने कदम उठें तो ,उठें इसी के उजियारों में //
आओ ,अपने सपने भर दें ,लोकतंत्र के गलियारों में ,
मिल-जुल कर हम रहना सीखें ,इसके सिंचित गुलजारों में/
इसे बनाना , इसे उठाना, लक्ष्य हमारा बस इतना हो ,
जब भी अपने कदम उठें तो ,उठें इसी के उजियारों में //
आओ हम भी लिखकर देखें इस भारत की नई कहानी ,
इसकी नदियों में बहता हो , अमृत जैसा निर्मल पानी /
इसके लोगों की ताकत का अंदाज लगाना मुश्किल हो ,
जहाँ - जहाँ भी हम निकलें तो ,छलके इसमें नई जबानी //
अच्छे -अच्छे लोग यहाँ हों ,सच्चे-सच्चे लोग यहाँ हों ,
एक तपोवन बन जाए यह, ऐसा हो हर हिन्दुस्तानी //
कोई कोशिस ऐसी करलें ,नहीं किसी का हक़ छिन पाए ,
थोड़ी- सी तकलीफें सह लें , भूखा कोई मर ना पाए /
मेहनत करने वालों का यह देश हमेशा कहलाया है ,
इसकी मिट्टी का अब कोई ,दिया ,कभी ना बुझने पाए //
लोग यहाँ जो पैदा होते ,जज्बा ऐसा हो जाता है ,
औरों की खातिर जीते हैं , दे देते हैं हर क़ुरबानी //
आओ हम भी लिखकर देखें इस भारत की नई कहानी ,
इसकी नदियों में बहता हो , अमृत जैसा निर्मल पानी /
इसके लोगों की ताकत का अंदाज लगाना मुश्किल हो ,
जहाँ - जहाँ भी हम निकलें तो ,छलके इसमें नई जबानी //
अच्छे -अच्छे लोग यहाँ हों ,सच्चे-सच्चे लोग यहाँ हों ,
एक तपोवन बन जाए यह, ऐसा हो हर हिन्दुस्तानी //
कोई कोशिस ऐसी करलें ,नहीं किसी का हक़ छिन पाए ,
थोड़ी- सी तकलीफें सह लें , भूखा कोई रह ना पाए /

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम खुद को देखा करते थे ,
पता नहीं अब अपनी सूरत जाने कैसी लगती है /
जितने मौसम आते थे वो छटा तुम्हारी लाते थे ,
पता नहीं अब फागुन की रुत जाने कैसी लगती है //

सीने में जो दर्द भरा है ,साँसें बाहर लाती हैं ,
एक हवा की थिरकन -सी वो पास तुम्हारे जाती हैं /
सिर्फ तुम्हारी मुस्कानों से फूल खिला जो करते थे ,
पता नहीं अब उनकी हालत जाने कैसी लगती है //

सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम ..

माना अब तो पलकों में बस ख्वाब उजाला करते हैं ,
सिर्फ तुम्हारी यादों के कुछ पर्वत पिघला करते हैं /
नदियाँ,सागर, झरने ,झीलें ,चुप-चुप बहते जाते हैं ,
पता नहीं यह गम दोने की आदत कैसी लगती है //

सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम खुद को देखा करते थे ,
पता नहीं अब अपनी सूरत जाने कैसी लगती है //
सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम खुद को देखा करते थे ,
पता नहीं अब अपनी सूरत जाने कैसी लगती है /
जितने मौसम आते थे वो छटा तुम्हारी लाते थे ,
पता नहीं अब फागुन की रुत जाने कैसी लगती है //

सीने में जो दर्द भरा है ,साँसें बाहर लाती हैं ,
एक हवा की थिरकन बनकर पास तुम्हें ले आती हैं /
सिर्फ तुम्हारी मुस्कानों से फूल खिला जो करते थे ,
पता नहीं अब उनकी हालत जाने कैसी लगती है //

सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम ..

माना अब तो पलकों में बस ख्वाब उजाला करते हैं ,
सिर्फ तुम्हारी यादों के कुछ पर्वत पिघला करते हैं /
नदियाँ,सागर, झरने ,झीलें ,चुप-चुप बहते जाते हैं ,
पता नहीं अब आदत जाने कैसी लगती है //

सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम खुद को देखा करते थे ,
पता नहीं अब अपनी सूरत जाने कैसी लगती है //

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम खुद को देखा करते थे ,
पता नहीं अब अपनी सूरत जाने कैसी लगती है /
जितने मौसम आते थे वो छटा तुम्हारी लाते थे ,
पता नहीं अब फागुन की रुत जाने कैसी लगती है //

... सीने में जो दर्द भरा है ,साँसें बाहर लाती हैं ,
एक हवा का झोंका बनकर पास तुम्हें ले आती हैं /
सिर्फ तुम्हारी मुस्कानों से फूल खिला जो करते थे ,
पता नहीं अब उनकी हालत जाने कैसी लगती है //

सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम ..

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

हवाओं से लिपट कर के , जरा मैंने कहा रुकना ,
अभी आँचल उड़ाती -सी उसी की याद आयेगी //
उसी की शोखियाँ होंगी ,उसी की मस्तियाँ होंगी ,
फिजाओं को लजाती -सी , हसीं सौगात आयेगी //

यहाँ जो स्वप्न बिखरे हैं ,जरा उनको समेटूंगा ,
उसी के हाथ की कोई बुनी तकदीर लौटूंगा //
उसी से रूठना है फिर ,उसी को फिर मनाना है ,
उसी के प्यार की कोई ,नई तस्वीर खींचूंगा //
बहारों को पता है ये ,अगर फिर चूड़ियाँ खनकीं ,
उसी के रश्क में डूबी , शबे -बारात आयेगी //

निशानी जो बचीं उसकी ,जिलाती जा रहीं हैं वो,
दृगों में जो भरा पानी , बहाती जा रहीं हैं वो //
उसी की हलचलों में यह , समय कुछ बीत जाता है ,
कहीं दिल की दराजों में ,समाती जा रहीं हैं वो //
दिशाओं में महकती है , कहीं वो रात -रानी -सी ,
कदम हौले बदाती -सी ,दिले -नाशाद आएगी //