देश में प्रमुख रूप से दो राजनीतिक दल हैं एक कांग्रेस दूसरा भाजपा /इसके अलावा जितने दल हैं किसी न किसी रूप में इन दोनों दलों के घटक दल हैं /कांग्रेस अल्पसंख्यकों तथा दलितों को बिना शर्त देश की मुख्य धारा में लाना चाहती है जबकि भाजपा अल्पसंख्यकों को यथास्थिति में रखना चाहती है तथा दलितों के साथ सदियों से चली आ रही वर्ण व्यवस्था से ऊपर उठकर रातों- रात उन्हें गले से लगाने को तत्पर नहीं ? जाहिर है यह सामाजिक सोच जो इन दोनों दलों की ताकत और कमजोरी का परिचायक भी है / देश में 85 प्रतिशत हिन्दू और 15 प्रतिशत अल्पसंख्यक हैं /आजादी के बाद देश के सभी हिन्दू संगठनों ने अल्पसंख्यक वर्ग को शक की निगाह से देखा और सभी अल्पसंख्यक वर्गों ने हिन्दू समाज को डर की निगाह से / मगर अब स्थिति बहुत बदल गई है / देश में भाई- चारा अपने चरम पर है पहले जैसा माहौल नहीं है /
इस बदली हुई परिस्थिति में जाति- धर्म आधारित दलों का बजूद में आना चिंता का विषय है /विशेषकर उत्तरप्रदेश में समाजवादी दल तथा बहुजन समाज दल का अलग से अपना जाल फैलाना देश को सौ साल पीछे धकेलता है / उन्हें कांग्रेस या भाजपा में रहकर देश के व्यापक हितों के बारे में सोचना चाहिए /वो अलग रहकर न तो अपने हितों की रक्षा कर पायेंगे न देश के सर्वांगीण विकास में भाग ले पाएंगे / ताली एक हाथ से नहीं दोनों हाथों से बजती है/ आखिर वो ऐसा क्यों सोचते हैं कि वो अलग बजूद में आकर सौदेबाजी कर सकेंगे / सौदेबाजी हर हाल में घातक है /
भाजपा विशेषकर हिन्दू संगठनों का दल है जिसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख है / भाजपा को सांप्रदायिक कहना अनुचित है / हिन्दू बहुल देश में हिन्दू दल नहीं होगा तो क्या हिन्दू विनाशक दल होगा ? मुझे आज तक यह दलील समझ नहीं आई कि भाजपा सांप्रदायिक है / यह दूसरी बात है कि यह दल अल्पसंख्यकों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने के लिए एक विश्वास भरी सार्थक पहल चाहता है /
कांग्रेस देश को अपने तरीके से जोड़ना चाहती है ,भाजपा अपने तरीके से / दोनों दलों की आर्थिक नीतियाँ लगभग समान हैं / विदेश नीति में भी कोई बड़ा फर्क नहीं सिर्फ कश्मीर को छोड़कर / कोई कितनी कोशिश करले भारत को इन दोनों दलों से मिलाकर ही अपने आकार में द्रष्टिगोचर होता /
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें