मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

लोकप्रियता की द्रष्टि से हिंदी कविता और उसका भविष्य
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आधुनिक हिंदी कविता के जनक अगर गिनाये जाएँ तो सुभद्रा कुमारी चौहान ,महादेवी बर्मा , सुमित्रा नंदन पन्त ,जय शंकर प्रसाद ,डाक्टर हरिवंश राय बच्चन और गोपालदास नीरज का नाम जबतक हिंदी कविता रहेगी अमर रहेगा / साथ ही कविता के समीक्षाकारों आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा हजारी प्रसाद द्विवेदी के बिना कविता की व्याख्या अधूरी रहेगी /यह युग लगभग साठ के दशक के साथ समाप्त हो गया /
उस ज़माने में दो साप्ताहिक पत्रिकाएं -धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान अत्यंत लोकप्रिय थे / पूरे हिंदी जगत में उनकी मान्यता थी /जो लेखक या कवि इन पत्रिकाओं में प्रकाशित हो जाते थे उन्हें साहित्यकार का दर्जा मिल जाता था / दोनों ही पत्रिकाएं बहुत ही उच्च स्तर की सामग्री प्रस्तुत करती थीं जिसे पाठक वर्ग बहुत ही रूचि से देखता था / बाद में ज्ञानोदय नाम की पत्रिका निकली उसका स्तर भी काफी अच्छा माना गया / मैं इन पत्रिकाओं का नियमित पाठक था /
जहाँ तक पाठ्यक्रम की बात है उसमें साहित्य की द्रष्टि से उसका पूरा प्रतिनिधित्व करने वाली रचनाओं का चयन होता था / जो विद्यार्थी अंग्रेजी साहित्य भी साथ पदते थे उन्हें हिंदी कविता और अंग्रेजी कविता का तुलनात्मक अध्ययन भी हो जाता था / जहाँ तक हिंदी कविता की बात है अंग्रेजी कविता से किसी भी द्रष्टि में कम नहीं थी बल्कि हिंदी कविता पर भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर थी जो उसे संस्कृत साहित्य से मिली थी /
सन [1960 ] में मैंने कविता लिखना शुरू कर दिया था /जब मैंने लिखना शुरू किया कविता में परिवर्तन लाने के प्रयास शुरू हो गये /ऐसे परिवर्तन जो कविता को कविता के रूप में ही नहीं बल्कि उसे उसके परम्परागत शिल्प , छन्द से मुक्त कर देने के लिए ,उसके बहिष्कार तक जा पहुंचे / मेरे लिए यह एक आघात था /
कवि नीरज जो उन दिनों में कवि सम्मेलनों के लोकप्रिय कवि के रूप में स्थापित हो चुके थे उन्हें भी इस तरह के प्रयास विचलित कर रहे थे /वो कविता के परम्परागत स्वरुप के समर्थक थे / एक तरफ कविता के खिलाफ चौतरफा हमला हो रहा था तो दूसरी तरफ कवि नीरज अकेले ही कविता को सींचते रहे जिलाते रहे /पत्र - पत्रिकाओं में अतुकांत कविता चल निकली /कवि सम्मेलनों में भी खपने लगी / मगर नीरज को कोई माई का लाल चुनौती नहीं दे पाया /
22 अक्तूबर 1961 को साप्ताहिक हिंदुस्तान में मेरा एक बालगीत प्रकाशित हुआ जो इस प्रकार था ---
जग है कितना सुन्दर सपना |
नीला अम्बर, चाँद, सितारे ,
चलो चलें हम नदी किनारे ,
तट पर जाकर देखेंगे हम,
लहरों का लहरों से मिलना |
जग है कितना सुन्दर सपना ||
आज मनुजता क्यों रोती है ,
क्यों दुःख के साये छाए हैं ?
निशि को देखो इठलाती है ,
इसने तो मोती पाए हैं |
मौसम में आकर्षण होता ,
जब आता फूलों को खिलना ||
आओ हम भी मिलकर खेलें ,
मस्त चांदनी में संग हो लें ,
गीत ख़ुशी का मिलकर गाएं ,
चलो सीपियाँ तट पर रोलें |
तन का दुःख भी मिट जायेगा ,
सुखी ह्रदय जब होगा अपना ||

इस बाल गीत के प्रकाशित हो जाने पर जैसे मैंने चैन की साँस ली |मुझे लगा मेरी कवितायेँ अब नियमित रूप से प्रकाशित होती रहेंगी |मैं साप्ताहिक के सह संपादक श्री बाल स्वरुप 'राही ' के संपर्क में था | वो मुझे बहुत स्नेह करते थे | उन्होंने मुझे समझाया मैं साप्ताहिक में छपने की अपेक्षा ना रखूं | देश की अन्य छोटी -छोटी पत्र -पत्रिकाओं में अपनी रचनाएँ भेजूं | मुझे छपने की कोई लालसा नहीं थी न मैं किसी लोकप्रियता का भूखा था | मुझे कवि सम्मेलनों में भाग लेना भी पसंद नहीं था | मैंने तय कर लिया था कि अगर कवितायेँ छपें तो सिर्फ साप्ताहिक में या फिर धर्मयुग में अन्यथा नहीं | फिर भी उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि मैं अपनी रचनाएँ उन्हें भेजता रहूँ |

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