सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम खुद को देखा करते थे ,
पता नहीं अब अपनी सूरत जाने कैसी लगती है /
जितने मौसम आते थे वो छटा तुम्हारी लाते थे ,
पता नहीं अब फागुन की रुत जाने कैसी लगती है //

... सीने में जो दर्द भरा है ,साँसें बाहर लाती हैं ,
एक हवा का झोंका बनकर पास तुम्हें ले आती हैं /
सिर्फ तुम्हारी मुस्कानों से फूल खिला जो करते थे ,
पता नहीं अब उनकी हालत जाने कैसी लगती है //

सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम ..

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