मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम खुद को देखा करते थे ,
पता नहीं अब अपनी सूरत जाने कैसी लगती है /
जितने मौसम आते थे वो छटा तुम्हारी लाते थे ,
पता नहीं अब फागुन की रुत जाने कैसी लगती है //

सीने में जो दर्द भरा है ,साँसें बाहर लाती हैं ,
एक हवा की थिरकन बनकर पास तुम्हें ले आती हैं /
सिर्फ तुम्हारी मुस्कानों से फूल खिला जो करते थे ,
पता नहीं अब उनकी हालत जाने कैसी लगती है //

सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम ..

माना अब तो पलकों में बस ख्वाब उजाला करते हैं ,
सिर्फ तुम्हारी यादों के कुछ पर्वत पिघला करते हैं /
नदियाँ,सागर, झरने ,झीलें ,चुप-चुप बहते जाते हैं ,
पता नहीं अब आदत जाने कैसी लगती है //

सिर्फ तुम्हारी आँखों में हम खुद को देखा करते थे ,
पता नहीं अब अपनी सूरत जाने कैसी लगती है //

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