शुक्रवार, 30 मार्च 2012

रची -बसी -सी सूरत कोई, इन आँखों में झलक रही है ,
शाम दली है लिए उदासी, छायाओं - सी सरक रही है ,
जितने मादक चित्र तुम्हारे, पलकों में जो अभी उतारे ,
उनकी कोई लालामी -सी, मीलों -मीलों दरक रही है //
कितने बंधन खुल जाते हैं ,अवचेतन में भौतिकता के ,
कितने गुम्फित हो जाते हैं,भाव , क्षणिक -सी लौकिकता के ,
रह जातीं हैं कितनी बेबस, अभिलाषाएं इस जीवन में ,
जैसे कोई छटा तुम्हारी ,पर्वत -पर्वत दमक रही है //

गुरुवार, 15 मार्च 2012

अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था ,
एक हवा का पागल झोंका मुझे मनाने आया था,
सिर्फ तुम्हारी कमी अखर कर मुझे सताने आई थी,
पता नहीं किस हालत में यह अपना वक्त बिताया था //

ओस गिरी जो पंखुरियों पर, नम पलकों से छलकी थी ,
सूरज की किरने पी-पी कर , सतवर्णी -सी दमकी थी,
चित्र तुम्हारा गदते -गदते ,पूरा हिया गलाया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //

अभी परिंदे कुछ चहके थे , व्याकुलतायें टूटीं थीं ,
तितली-भोंरों ने मंडराकर ,आकुलतायें लूटीं थीं ,
बचा हुआ था कुछ तो मुझमें ,शायद मुझे बताया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //

ऐसे भी मैं जी लेता हूँ,पल जो मुझको मिल जाते हैं,
पता नहीं क्यों इतने मादक द्रश्य यहाँ खिल जाते हैं ,
कहीं तुम्हारा अबलंबन था , मुझसे मिलने आया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //
अभी परिंदे कुछ चहके थे , व्याकुलतायें टूटीं थीं ,
तितली-भोंरों ने मंडराकर ,आकुलतायें लूटीं थीं ,
बचा हुआ था कुछ तो मुझमें ,शायद मुझे बताया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //
ऐसे भी मैं जी लेता हूँ,पल जो मुझको मिल जाते हैं,
पता नहीं क्यों इतने मादक द्रश्य यहाँ खिल जाते हैं ,
कहीं तुम्हारा अबलंबन था , मुझसे मिलने आया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //

मंगलवार, 13 मार्च 2012

अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था ,
एक हवा का पागल झोंका मुझे मनाने आया था,
सिर्फ तुम्हारी कमी अखर कर मुझे सताने आई थी,
पता नहीं किस हालत में यह अपना वक्त बिताया था //

सोमवार, 12 मार्च 2012

ओस गिरी जो पंखुरियों पर, नम पलकों से छलकी थी ,
सूरज की किरने पी-पी कर , सतवर्णी -सी दमकी थी,
चित्र तुम्हारा गदते -गदते ,पूरा हिया गलाया था ,
अभी सुबह से बातें करके अपना मन बहलाया था //

गुरुवार, 8 मार्च 2012

देश में प्रमुख रूप से दो राजनीतिक दल हैं एक कांग्रेस दूसरा भाजपा /इसके अलावा जितने दल हैं किसी न किसी रूप में इन दोनों दलों के घटक दल हैं /कांग्रेस अल्पसंख्यकों तथा दलितों को बिना शर्त देश की मुख्य धारा में लाना चाहती है जबकि भाजपा अल्पसंख्यकों को यथास्थिति में रखना चाहती है तथा दलितों के साथ सदियों से चली आ रही वर्ण व्यवस्था से ऊपर उठकर रातों- रात उन्हें गले से लगाने को तत्पर नहीं ? जाहिर है यह सामाजिक सोच जो इन दोनों दलों की ताकत और कमजोरी का परिचायक भी है / देश में 85 प्रतिशत हिन्दू और 15 प्रतिशत अल्पसंख्यक हैं /आजादी के बाद देश के सभी हिन्दू संगठनों ने अल्पसंख्यक वर्ग को शक की निगाह से देखा और सभी अल्पसंख्यक वर्गों ने हिन्दू समाज को डर की निगाह से / मगर अब स्थिति बहुत बदल गई है / देश में भाई- चारा अपने चरम पर है पहले जैसा माहौल नहीं है /
इस बदली हुई परिस्थिति में जाति- धर्म आधारित दलों का बजूद में आना चिंता का विषय है /विशेषकर उत्तरप्रदेश में समाजवादी दल तथा बहुजन समाज दल का अलग से अपना जाल फैलाना देश को सौ साल पीछे धकेलता है / उन्हें कांग्रेस या भाजपा में रहकर देश के व्यापक हितों के बारे में सोचना चाहिए /वो अलग रहकर न तो अपने हितों की रक्षा कर पायेंगे न देश के सर्वांगीण विकास में भाग ले पाएंगे / ताली एक हाथ से नहीं दोनों हाथों से बजती है/ आखिर वो ऐसा क्यों सोचते हैं कि वो अलग बजूद में आकर सौदेबाजी कर सकेंगे / सौदेबाजी हर हाल में घातक है /
भाजपा विशेषकर हिन्दू संगठनों का दल है जिसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख है / भाजपा को सांप्रदायिक कहना अनुचित है / हिन्दू बहुल देश में हिन्दू दल नहीं होगा तो क्या हिन्दू विनाशक दल होगा ? मुझे आज तक यह दलील समझ नहीं आई कि भाजपा सांप्रदायिक है / यह दूसरी बात है कि यह दल अल्पसंख्यकों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने के लिए एक विश्वास भरी सार्थक पहल चाहता है /
कांग्रेस देश को अपने तरीके से जोड़ना चाहती है ,भाजपा अपने तरीके से / दोनों दलों की आर्थिक नीतियाँ लगभग समान हैं / विदेश नीति में भी कोई बड़ा फर्क नहीं सिर्फ कश्मीर को छोड़कर / कोई कितनी कोशिश करले भारत को इन दोनों दलों से मिलाकर ही अपने आकार में द्रष्टिगोचर होता /