सिमट रहीं थीं जब तुम
सिमट रही थी दुनिया मुझमें ,
शायद कोई इस जीवन की
सँवर रही थी दुनिया मुझमें /
मुझे पता था अरमानों का
तुम्हें पता था तूफानों का,
जाने कितनी हलचल लेकर
उतर रही थी दुनिया मुझमें /
फूलों ने आबाज लगाई
नाजुक कलियाँ लगीं मचलने ,
तुमसे जो अधिकार मिले थे
सीमायें सब लगीं फिसलने /
नहीं पता था अंजामों का
आने वाले संग्रामों का ,
कितने जीते ,हार गए हम
आशायें सब लगीं उमड़ने /
मौसम आये ,मचल गए सब
ऋतुओं के संग पिघल गए सब,
दीवानापन कुछ ऐसा था
हद से हद तक गुजर गए सब /
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