tushar
बुधवार, 12 अक्टूबर 2011
रात भर चांदनी को बटोरा ,भर गया आँखों का कटोरा ,
देखता रहा जिन्दगी के किनारे अठखेलियाँ तुम्हारी ,
कभी डूब कर उतरा , कभी टूट कर बिखरा , कहाँ -कहाँ तक ,
लूटने आया न जाने कौन ,लूटकर चल दिया लुटेरा /
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें