tushar
रविवार, 2 अक्टूबर 2011
कभी प्रकृति के परिधानों में , सज -सज कर तुम आ आती हो ,
कभी फूल की डाली पर तुम , मुस्कानों -सी खिल जाती हो ,
तितली -भोंरे भी मंडरा कर , अक्सर ये पूछा करते हैं ,
दिल की कितनी बातें मुझसे ,चुपके-चुपके कर जाती हो ,
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