रविवार, 4 सितंबर 2011


मेरी पलकें कब सूखीं थीं ,पता नहीं क्यों धरती भीगी ,
इनमें सपने तैर रहे थे पता नहीं क्यों किश्ती डूबी ,
इनमें मौसम आकर उतरे ,इनमें रस के बादल बरसे ,
इनमें कोई समा गया था ,फिर क्यों झरती कलियाँ दीखीं ,

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